मार्च 20, 2011

प्रेम पत्र

प्रेत  आएगा
किताब से निकाल ले जाएगा प्रेम पत्र
गिद्ध उसे पहाड़ पर नोच-नोच खाएगा

चोर आएगा तो प्रेम पत्र चुराएगा
जुआरी प्रेम पत्र पर ही दांव लगाएगा
ऋषि आएंगे तो दान में मागेंगे प्रेम पत्र

बारिश आएगी तो
प्रेम पत्र ही गलाएगी
आग आएगी तो जलाएगी प्रेम पत्र
बन्दिशें प्रेम पत्र पर ही लगाई जाएंगी

साँप आएगा तो डँसेगा प्रेम पत्र
झींगुर आएंगे तो चाटेंगे प्रेम पत्र
कीड़े प्रेम पत्र ही काटेंगे

प्रलय के दिनों में
सप्तर्षि, मछली और मनु
सब वेद बचाएंगे
कोई नहीं बचाएगा प्रेम पत्र

कोई रोम बचाएगा
कोई मदीना
कोई चाँदी बचाएगा, कोई सोना
मैं निपट अकेला
कैसे बचाऊंगा तुम्हारा प्रेम पत्र ।              
                                                ................. बद्रीनारायण  

सितंबर 28, 2010

दूसरा बनवास

कैफी साहब की यह नज़्म, आज इस उम्मीद के साथ पोस्ट कर रहा हूँ, कि आनेवाले किसी कल में राम को फिर से बनवास न मिले ।
2 अक्टूबर पास है और जिनके लिए यह दिन  उत्सव और घृणा के प्रदर्शन से परे, खुद की 'ईमानदारी' और 'देशभक्ति' को परखने का मौका होता है, उनसे यह विशेष आग्रह है कि दोनों हाथ उठाकर 'जागते रहें' और दूसरों की नींद तोड़ते रहें ।

राम बनवास से लौट कर जब घर में आए
याद जंगल बहुत आया जो नगर में आए
रक्से दीवानगी आँगन में जो देखा होगा
छह दिसंबर को सिरीराम ने सोचा होगा
इतने दीवाने कहाँ से मेरे घर में आए ।

जगमगाते के जहाँ राम के कदमों के निशां
प्यार की कहकशां लेती थी अंगड़ाई जहाँ
मोड़ नफरत के उसी राहगुजर में आए ।

धर्म क्या उनका है क्या जात है यह जानता कौन
घर  न जलता तो उन्हें रात में पहचानता कौन
घर जलाने को मेरा यार लोग जो घर में आए ।

शाकाहारी हैं मेरे दोस्त तुम्हारा खंजर
तुमने बाबर की तरफ फेंके थे सारे पत्थर
हैं मेरे सर की खता जख्म जो सर में आए ।

पाँव सरयू में अभी राम ने धोए भी न थे
कि नज़र आए वहाँ खून के गहरे धब्बे
पाँव धोए बिना सरयू के किनारे से उठे
राम ये कहते हुए अपने दुआरे से उठे
राजधानी की फिजाँ आई नहीं रास मुझे
छह दिसंबर को मिला दूसरा बनवास मुझे ।.....                कैफी आज़मी

सितंबर 20, 2010

कमल के फूल

फूल लाया हूँ कमल के ।
क्या करूँ इनका ?
पसारें आप आँचल,
छोड़ दूँ,
हो जाए जी हल्का !

किन्तु क्या होगा कमल के फूल का ?

कुछ नहीं होता
किसी की भूल का-
मेरी कि तेरी हो-
ये कमल के फूल केवल भूल हैं ।

भूल से आँचल भरूँ ना
गोद में इनके सम्हाले
मैं वजन इनके मरूँ ना ।

ये कमल के फूल
लेकिन मानसर के हैं,
इन्हें हूँ बीच से लाया
ना समझो तरी पर के हैं ।

भूल भी यदि है
अछूती भूल है ?
मानसर वाले
कमल के फूल हैं । .........भवानीप्रसाद मिश्र

जुलाई 27, 2010

सावन घन प्राणों में बरसे

सावन आ गया, आया ही नहीं इसका आना दिख भी रहा है, पूरे आषाढ़ बादल रुठे रहे, आते थे पर बरसने को उनकी इच्छा ही नहीं होती थी । अब सावन में पहले ही दिन से घेरे हैं, धरती की प्यास देर से ही सही तृप्त कर रहे हैं ।

सावन पर निराला की दो रचनाएँ -


(1)
प्यासे तुमसे भरकर हरसे ।
सावन घन प्राणों में  बरसे ।

उनयी आँखों में श्याम घटा,
विद्युत की नस-नस नई छटा,

फैली हरियाली अटा-अटा
अंगों के रंगों के परसे ।

अविरत रिमझिम वीणा द्रिमद्रिम;
प्रति छन रेलती पवन पश्चिम
मृदंग वादन, गति अविकृत्रिम
जी के भीतर से, बाहर से ।

(2)

धिक मद, गरजे बदरवा,
चमकि बिजुली डरपावे,
सुहावे सघन झर, नरवा
         कगरवा कगरवा ।