सितंबर 28, 2010

दूसरा बनवास

कैफी साहब की यह नज़्म, आज इस उम्मीद के साथ पोस्ट कर रहा हूँ, कि आनेवाले किसी कल में राम को फिर से बनवास न मिले ।
2 अक्टूबर पास है और जिनके लिए यह दिन  उत्सव और घृणा के प्रदर्शन से परे, खुद की 'ईमानदारी' और 'देशभक्ति' को परखने का मौका होता है, उनसे यह विशेष आग्रह है कि दोनों हाथ उठाकर 'जागते रहें' और दूसरों की नींद तोड़ते रहें ।

राम बनवास से लौट कर जब घर में आए
याद जंगल बहुत आया जो नगर में आए
रक्से दीवानगी आँगन में जो देखा होगा
छह दिसंबर को सिरीराम ने सोचा होगा
इतने दीवाने कहाँ से मेरे घर में आए ।

जगमगाते के जहाँ राम के कदमों के निशां
प्यार की कहकशां लेती थी अंगड़ाई जहाँ
मोड़ नफरत के उसी राहगुजर में आए ।

धर्म क्या उनका है क्या जात है यह जानता कौन
घर  न जलता तो उन्हें रात में पहचानता कौन
घर जलाने को मेरा यार लोग जो घर में आए ।

शाकाहारी हैं मेरे दोस्त तुम्हारा खंजर
तुमने बाबर की तरफ फेंके थे सारे पत्थर
हैं मेरे सर की खता जख्म जो सर में आए ।

पाँव सरयू में अभी राम ने धोए भी न थे
कि नज़र आए वहाँ खून के गहरे धब्बे
पाँव धोए बिना सरयू के किनारे से उठे
राम ये कहते हुए अपने दुआरे से उठे
राजधानी की फिजाँ आई नहीं रास मुझे
छह दिसंबर को मिला दूसरा बनवास मुझे ।.....                कैफी आज़मी

सितंबर 20, 2010

कमल के फूल

फूल लाया हूँ कमल के ।
क्या करूँ इनका ?
पसारें आप आँचल,
छोड़ दूँ,
हो जाए जी हल्का !

किन्तु क्या होगा कमल के फूल का ?

कुछ नहीं होता
किसी की भूल का-
मेरी कि तेरी हो-
ये कमल के फूल केवल भूल हैं ।

भूल से आँचल भरूँ ना
गोद में इनके सम्हाले
मैं वजन इनके मरूँ ना ।

ये कमल के फूल
लेकिन मानसर के हैं,
इन्हें हूँ बीच से लाया
ना समझो तरी पर के हैं ।

भूल भी यदि है
अछूती भूल है ?
मानसर वाले
कमल के फूल हैं । .........भवानीप्रसाद मिश्र

जुलाई 27, 2010

सावन घन प्राणों में बरसे

सावन आ गया, आया ही नहीं इसका आना दिख भी रहा है, पूरे आषाढ़ बादल रुठे रहे, आते थे पर बरसने को उनकी इच्छा ही नहीं होती थी । अब सावन में पहले ही दिन से घेरे हैं, धरती की प्यास देर से ही सही तृप्त कर रहे हैं ।

सावन पर निराला की दो रचनाएँ -


(1)
प्यासे तुमसे भरकर हरसे ।
सावन घन प्राणों में  बरसे ।

उनयी आँखों में श्याम घटा,
विद्युत की नस-नस नई छटा,

फैली हरियाली अटा-अटा
अंगों के रंगों के परसे ।

अविरत रिमझिम वीणा द्रिमद्रिम;
प्रति छन रेलती पवन पश्चिम
मृदंग वादन, गति अविकृत्रिम
जी के भीतर से, बाहर से ।

(2)

धिक मद, गरजे बदरवा,
चमकि बिजुली डरपावे,
सुहावे सघन झर, नरवा
         कगरवा कगरवा ।

जुलाई 16, 2010

यह घाव कितना गहरा है ?

      कश्मीर के बारे में खबरें आ रही हैं कि वहाँ हालात 1989 के जैसे हो गए हैं, जबकि आतंकियों की बंदूकें  वहाँ शांत हैं, आखिर यह स्थिति कैसे हो गई ? कश्मीर शांत दिखने लगा था फिर ये स्थिति कैसे हो गई, तो क्या वह खामोशी झूठी थी ? 27 जून 2010 को जनसत्ता में पंकज चतुर्वेदी की डल झील पर एक बेहद संवेदनशील रपट प्रकाशित हुई थी, डल झील के बहाने समूचे कश्मीर के दर्द को समझने का ईमानदार प्रयास वहाँ था । श्री भृगुनन्दन त्रिपाठी ने यह टिप्पणी उसी रपट के बाद लिखी, कश्मीर के यथार्थ को खंगालती यह टिप्पणी आपको उसकी परंपरा और यथार्थ से परिचित कराने की एक विनम्र कोशिश है । पंकज चतुर्वेदी की रपट के छपे और इस टिप्पणी के लिखे भी कुछ दिन गुजर गए हैं, और कश्मीर के हालात ऐसे हैं कि उसे रोज बिगड़ता हुआ घोषित किया जा रहा है । उम्मीदों का रास्ता सहल नहीं है, पर चलना तो है ही । कश्मीर को ऐसे में अकेला छोडना आत्मघाती होगा ।

 पिछले 27 जून रविवार को जनसत्ता में पंकज चतुर्वेदी का श्रीनगर की विश्वप्रसिद्ध डल झील पर प्रकाशित रपट आठ आठ आँसू रुलानेवाली है । उसे पढ़ते हुए मुझे कश्मीरी कवि अग्निशेखर की अनेक कविताएँ याद आती रहीं ।  उन्होंने वितस्ता पर, पान्द्रेठन के मंदिर, शंकराचार्य पर्वत और चिनार पर टीसती कविताएँ लिखी हैं । मुझे उन सबकी बेतरह याद आती रही ।  कश्मीर और भारत के अगणित लोगों की तरह कश्मीर मेरा भी घाव है जो रह रह कर हरा हो आता है । आज से 20 वर्ष पहले 1990 में कश्मीर के हिन्दी कवि अग्निशेखर ने एक कविता लिखी थी---भागे पंडित । शुरुआती पंक्तियाँ थीं :
            “ उनका क्या था इस भूमि पर, भागे पंडित
            कायर मुखबिर चुगलखोर थे, भागे पंडित
            उन्हें कहाँ था प्यार वतन से भागे पंडित
            पैदल भागे, दौड़ लगाते बिना वजह के, भागे पंडित”
कथन की युक्तियुक्तता का और खुद अपना ही माखौल उड़ाते व्यंग्य का यह स्वर उनका है जो भागने वालों  के पीछे रह गए हैं । यानी जो भागनेवाले हैं या उनमें शामिल हैं । और यह रहा पीछे छूट गया मंजर जो चीखते मौन में आत्मकथ्य बयान कर रहा है :
            “ मंदिर सुने, गलियां सुनी, सन्नाटा है, भागे पंडित
            त्योहारों की तिथियाँ सुनीं, जेबें सुनीं, भागे पंडित
            घर से भागे, डर से भागे, षड्यंत्रों से भागे पंडित
            किसको चिंता, नदियाँ सूखीं, लावारिस हैं, भागे पंडित”
कश्मीर क्रूर अनिश्चयों भरी दारुण नियति का लंबे समय से शिकार रहा है । निराला के शब्दों में वह क्रूर काल तांडव की स्मृति रेखा है । कश्मीरी कविता की माँ लल्द्यद एक वाख में कहती हैं : “ अभी जलता हुआ चुल्हा देखा और अभी उसमें न धुआं देखा न आग । अभी पांडवों की माता को देखा और अभी उसे एक कुम्हारिन के यहाँ शरणागता मौसी के रूप में देखा ।“ वे आगे कहती हैं :
            “ दमी डीठुम नद वहवुनी
             दमी ड्यूठुम सुम न तू तार
             दमी डीठुम ठार फोलुवनी
             दमी ड्यूठुम गुल न तु खार
(अभी मैंने बहती हुई नदी को देखा और अभी उस पर न कोई सेतु देखा और न पार उतरने के लिए पुलिया ही । अभी खिले हुई फूलों की एक डाली देखी और अभी उसपर न गुल देखे और न काँटे । )
पिछले 20 जून को खबर आई थी कि कश्मीर में श्रीनगर के खीर भवानी मंदिर के सालाना जलसे में  इस बार पचास हजार से अधिक लोग शामिल हुए । उल्लेखनीय तथ्य यह है कि इस साल इस त्योहार में इक्कीस वर्षों पूर्व विस्थापित हुए कश्मीरी पंडित भी काफी बड़ी संख्या में शामिल हुए और पूजा अर्चना की । इस राष्ट्रीय महत्त्व की उल्लेखनीय घटना का संपूर्ण श्रेय वहाँ के युवा मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को जाता है । उन्होंने यह महत्त्वपूर्ण शुरुआत की है जिसमें बीस से ज्यादा वर्षों की अपमानभरी जलावतनी में पड़े कश्मीरी पंडितों के घर वापस लौटाने की सम्मानपूर्ण पहल दिखाई पड़ती है और जिसमें न्यायसंगत पुनर्वास, सद्भाव, और शांति की आशा बंधती है । अपने ही देश में असह्य रूप से अपमान भरा कसैला निर्वासन भोगते हुए कश्मीरी पंडित दशकों से राहत शिविरों तथा बेगाने हो चुके देश समाज में आजीविका के लिए तिलमिलाते हुए भटकते रहे हैं । उनेक साथ इस बीच क्या कुछ हुआ इसकी कोई राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक लेखी नहीं है । कश्मीरी पंडितों का यह यंत्रणा और उत्पीड़न भरा दग्ध इतिहास बीसवीं और इक्कीसवीं सदियों के अंत और प्रारंभ का वह राष्ट्रीय कलंक है जिसे महज एक शर्मनाक हादसा कहकर छुट्टी नहीं पाई जा सकती ।  यह एक आईना है जिसमें राष्ट्रीय राजनीति को अपना चेहरा देखना चाहिए । क्या पक्ष, क्या विपक्ष क्या क्षेत्रीय, क्या राष्ट्रीय, क्या दक्षिण और क्या वाम – सभी इस आईने में अपना वह असली चेहरा देख सकते हैं जिसे देखने के बाद प्रदर्शित-विज्ञापित चेहरा अजनबी लगने लगे । अपने प्रश्नों- उत्तरों, अपनी चुप्पी और मुखरताओं की असलियत की पैमाइश और पहचान करते हुए । भारत की संसदीय राजनीति की प्रवंचनाओं में यह यह एक सबसे ज्वलंत और सबसे प्रासंगिक प्रवंचना है । उमर अब्दुल्ला जैसा एक गैरमौसमी, लंबी और स्थाई राजनीति का जज्बा और मंसूबा रखनेवाला जोशीला और होशियार राजनेता ही यह पहल कर सकता था । शायद इस पहल में एक अपेक्षित दुस्साहस है । पर कश्मीर और उसके मुतल्लिक भारतीय राजनीति में ऐसे ही रचनात्मक दुस्साहस की दरकार है ।
      निश्चय जी यह पहल काफी नहीं है । कसश्मीरी पंडितों और वहाँ की हिंदू जनता के स्थाई पुनर्वास; उनकी छिन चुकी जमीन, घर,बाग बगीचे आदि की अक्षुण्ण – अनाहत वापसी के लिए भी सरकारी और गैर सरकारी पहल होनी चाहिए । बिना ऐसा किए उनके विश्वासों की और उनकी अस्मिता एवं प्रतिष्ठा की बहाली संभव नहीं है । निश्चय ही इसमें कश्मीर के बुद्धिजीवियों लेखकों-पत्रकारों, कलाकारों और सबसे बढ़कर युवाओं का सहयोग अपरिहार्य है । अगर हो सके, तो कहना न होगा कि एक बड़ी मिसाल कायम होगी जिसका असर पूरे देश और दुनिया पर पड़ेगा । असली कश्मीरियत की जो धमक उमर अब्दुल्ला की इस पहल में देखी-सुनी गई उसका प्रीतिकर विस्फोट  हो सकता है । तब और केवल तभी धरती के स्वर्ग या जन्नत को फिर से पाया जा सकेगा । कश्मीर की बहुसंख्यक आबादी की गरीबी और फटेहाली को दूर करने की दिशा में; वहाँ की खेती, उद्योग-धंधे, दस्तकारी के संवार-निखार; खुशहाली और जिंदादिली की बहाली; कला-कौशल-संगीत और भाषा साहित्य-संस्कृति की ऊँचाइयों-गहराइयों को फिर से पाने के सपने तभी साकार हो सकेंगे । असली कश्मीरियत की बहाली कश्मीरी पंडितों की घर वापसी के साथ ही उस डल झील के पुनरुद्धार, वितस्ता आदि नदियों के निर्मलीकरण के संयुक्त और व्यापक अभियानों  के बिना संभव नहीं है । धरती का यह स्वर्ग कब तक धर्म और मजहब के दरिंदों का अखाड़ा बना रहेगा ? इसपर किन असुरों के आधिपत्य के लिए देवताओं को विस्थापित और निर्वासित किया जाता रहा है ? अपने गौरवशाली अतीत से काटकर कैसा हो गया कश्मीर ? आनंदवर्धन, मम्मट, अभिनवगुप्त, सोमदेव, क्षेमेन्द्र, कल्हण, लल्द्यद, हन्वा खातून आदि को विस्मृत कर तंत्र-योग-दर्शन-काव्य-कला-संगीत आदि की इस धरती की वह पहचान क्या फिर से पाई जा सकेगी ? आज यह जन्नत क्यों दोज़ख़ में बदलता जा रहा है ? निश्चय ही ये सवाल उमर अब्दुल्ला के जेहन में हैं और वे इसीलिए हैं की कश्मीरी जनता के हैं ये सवाल । उसे दशकों से मथ रहे हैं, बेचैन कर रहे हैं । लल्द्यद  कहती हैं: 
            “दोद क्या जानि यस न बने  
            गमुक्य जामु हा वलिथ तने ।
            गर गर फीरस फीरस प्ययम कने
            ड्यूठुम नु कह ति पननि कने ।।
(जिस पर दुख न पड़ा हो वह भला दर्द क्या जाने ? गम के वस्त्र पहनकर मैं घर-घर फिरी और मुझपर पत्थर बरसे तथा किसी को भी मेरा पक्ष लेते हुए न देखा ।)
      यह सच है । गमजदा कश्मीर का पक्ष लेता कोई दिखाई नहीं पड़ता । स्वयं कश्मीरी भाषा जहाँ भू-लुंठित और पद दलित है, जहाँ अपने अतीत, अपनी स्मृतियों और विरासत को लीपने-पोंछने की साजिशें चल रही हैं, अपनों से ज्यादा जहाँ जाती मामलों में गैर दिलचस्पी लेने लगे हैं और कुछ लोगों को जहाँ यह अच्छा लग रहा है, उसी कश्मीर और कश्मीरी कवयित्री का यह घाव सचमुच कितना हरा है ?
                                                भृगुनन्दन त्रिपाठी
                                                9631258579
                                       
                           
  

जून 18, 2010

कल्पना वाला बच्चा

शबीह की एक कविता पिछले पोस्ट में दी गई थी, यहाँ उनकी एक दूसरी कविता पढ़िए ।


गुलाब की सेज पर
लेटा, वो बच्चा !
रूई-से बिस्तर पर
सोया, वो बच्चा !

वो बच्चा,
जिसका भोलेपन भरा चेहरा,
प्यार भरी आँखें,
रस भरे होंठ,
किलकारियों भरी आवाज़,
लाल-लाल गाल,
छोटे-छोटे हाथ और पैर
जिसको छूने का मन चाहे,
थामने को दिल चाहे ।

'प्यार करने को कोई ऐसा होता
तो कल्पना सच हो जाती।'

जून 10, 2010

हमारी नयी ज़िंदगी

शबीह ने अभी बारहवीं की परीक्षा पास की है, कविताओं से इन का नाता खून पानी का है, नौ दस साल की होंगी तब से ही शबीह ने कविता के साथ उठना बैठना शुरू कर दिया था, छोटी उम्र में  ही उनकी कविताओं ने अनुभवों की निजता का परिचय दे दिया है, शबीह का पहला संकलन 'हमारी नयी ज़िंदगी ' 2006 में आ चुका है । शमीम हनफी और अरुण कमल ने इसकी भूमिका लिखी है। इस संकलन से इसी शीर्षक वाली कविता, यह नौ दस साल की उम्र में ही लिखी गई थी.................


चाँद की चाँदनी होती है
जो फूलों में जाकर सोती है
नन्हें बच्चों की आवाज़ कैसी होती है ?
चिड़ियों की चहचहाहट -सी होती है । 

फूल तो प्यारे होते हैं
उन्हें छूकर हवा बहती है
उनमें से कुछ पत्तियां बरसती हैं

उन्हीं कोमल फूल की पत्तियों से,
फूल जैसे बच्चों से 
धरती की पवित्रता से,
बहते झरने से,
चाँद-सितारों से, 
बरसते पानी की बूँदों से,
हमारे माँ - बाप से 
शुरू होती है हमारी नयी ज़िंदगी !
                                                 -शबीह राहत 

 

मई 18, 2010

लोकमान्य की कुछ तस्वीरें


लोकमान्य बालगंगाधर तिलक और उनसे जुड़ी  कुछ तस्वीरें ,,,,,,,,,

(ये तस्वीरें प्रभा में 1920 में तिलक महाराज के निधन के पश्चात प्रकाशित हुई थीं, वहीं से इन्हें साभार प्रस्तुत किया जा रहा है । ये तनिक धुँधली जान पड़ सकती हैं, पर 90 वर्षों के बाद भी इनमें इतनी भावना भरी है, कि उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है,  'प्रभा' के संपादक श्री गणेशशंकर विद्यार्थी और श्री देवदत्त शर्मा थे । तिलक 'युवा हृदय सम्राट' थे, इस ब्लॉग में उनसे जुड़ी कुछ और चीजें देने का प्रयास किया जाएगा, बहरहाल ये तस्वीरें देखिए....... 

मई 11, 2010

राजेंद्रबाबू मेरे सर-माथे पर

राजेंद्र प्रसाद की ख्याति उनके छात्र जीवन में ही सार्वदेशिक हो गई थी, प्रसिद्ध है कि उनकी उत्तरपुस्तिका पर परीक्षार्थी के परीक्षक से श्रेष्ठ होने की टिप्पणी की गई थी । पटना में हाईकोर्ट खुलने से पहले वे कलकत्ता में वकालत करते थे, वकालत में भी उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया । वे गांधी के सच्चे अनुयायी थे, गांधी की पहली कर्मभूमि ‘चंपारण’ में वे उनके साथ-साथ थे । राजेंद्रबाबू सरलमना थे, एक उदार और करुण हृदय के स्वामी । तामझाम और आडंबर से दूर; गांधी की संगत ने उन्हें और भी तपा दिया था ।


वे बिहार प्रदेश काँग्रेस कमेटी के लंबे समय तक अध्यक्ष भी रहे । उन्हीं दिनों सुभाषचंद्र बोस एक बार पटना आए । राजेंद्रबाबू और सुभाषबाबू से जुड़ा एक संस्मरण रामबुझावनबाबू के खजाने से । (कोशिश की है कि उनके शब्दों में ही प्रस्तुत करूँ)

(प्रो. रामबुझावन सिंह; घर मसौढ़ी, सौ में दस कम यानी नब्बे; इतने ही वर्षों से वे इस दुनिया को देखते आ रहे हैं. और उनकी आँखों में जीवन इतना भरा है कि इतने और वर्षों की यात्रा अभी भी मजे से की जा सकती है, न जाने कितनी पीढ़ियों ने उन्हें देखा और उनसे पढ़ा है, आज के दिन देश के संभवतः सबसे बुजुर्ग शिक्षक. अभी बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् के निदेशक हैं. रामबुझावन बाबू स्मृतियों के कोष हैं, कोशिश करूंगा कि आगे भी उनसे कुछ पाकर आपसे साझा कर सकूं.


सुभाषबाबू पटना स्टेशन पर उतरे । वे स्वामी सहजानंद सरस्वती के निमंत्रण पर पटना आए थे और उन्हें बिहार में पटना समेत कई स्थानों पर सभाएँ करनी थीं । पटना में उनके स्वागत की कुछ अलग ही तैयारी थी । कदमकुआँ के कायस्थ समाज ने प्रण कर लिया था कि सुभाषचंद्र बोस को पटना प्रवेश करने नहीं देंगे । कारण क्या था – कलकत्ता में राजेंद्रबाबू के साथ बंगाली भद्रलोक ने अभद्रता की थी और इस घटना ने यहाँ के लोगों को उद्वेलित कर दिया था, उनका आरोप था कि यह सब सुभाषबाबू के इशारे पर हुआ । और इसी से पटना में उन्हें प्रवेश करने नहीं दिया जाएगा । सुभाषबाबू के इस विशेष स्वागत की तैयारी हो चुकी थी । कदमकुआँ का कायस्थ समाज स्टेशन पर जुट गया था, और इसे देखने के लिए हमारे जैसे छात्र भी जुटे थे, सुभाष बाबू गाड़ी से निकले नहीं कि इनसे घिर गए । कैसे कैसे कर के बाहर निकाले गए । उस दिन लॉन (आज के गांधी मैदान) में उनकी सभा होनी थी नहीं हो पाई । उपद्रवियों की ही चली, सुभाष बाबू उस दिन उत्तरबिहार चले आए और वहाँ सभा की । पटना का कार्यक्रम दूसरे दिन का बना । हम छात्रों में उन्हें सुनने की अलग ही ललक थी, पर सभा तो हो नहीं पाई । पटना मे सभा कैसे हो यह समस्या थी, तब जयप्रकाश नारायण को रांची से खबर दे कर बुलवाया गया । काट जेपी ही थे । जेपी आए और तब कार्यक्रम तय हुआ । सभा के दिन सुभाषबाबू के रास्ते में छात्रों और युवाओं का रेला था । सुभाषबाबू घोड़ागाड़ी पर थे और उनके साथ स्वामी सहजानंद सरस्वती थे, गाड़ी को घोड़ा क्या खींचता, हम छात्र ही खींचे चले आ रहे थे, सुभाषबाबू का जयघोष कर रहे थे, हमारी तनिक जिद्द थी कि उनके मुख से कुछ आशीर्वचन सुन लें, स्वामीजी अनमना रहे थे, वे इसके लिए तैयार नहीं थे ।

 पर सुभाषबाबू तैयार हो गए, कहा ये ही तो देश के भविष्य हैं । घोड़ागाड़ी पर ही खड़े होकर बोलना शुरू कर दिया, वह विराट व्यक्तित्व- क्या कहूँ । और पाँच मिनट तक कहते रहे- क्या समझ में आया, क्या नहीं, याद नहीं । बस सुभाषबाबू की जय करते हुए चले आए । शाम को सभा हुई, जेपी मंच पर बैठे थे और कदमकुआँ का कायस्थ समाज भी, जिन्होंने कोलाहल किया था आज शांत थे, दर्शक थे । जेपी ने अपने धीर-गंभीर स्वर में कहा-आप सब की सुनें, मानना या न मानना आपके ऊपर है । एक एक शब्द इस तरह से जैसे कोई शिक्षक अपने छात्रों को सीखा रहा हो । गहरी नदी की तरह । और जब सुभाषबाबू की बोलने की बारी आई मत पुछो, लगता था जैसे एक-एक शब्द बम हो । उनकी आवाज़ में बम फट रहा हो । शुरू ही किया उन्होंने कौन कहता है राजेंद्रबाबू के साथ अभद्रता में मेरी भूमिका है, अरे, राजेंद्रबाबू को तो मैं अपने माथे पर रखता हूँ । राजेंद्रबाबू को मैं अपने माथे पर रखता हूँ ।  फिर क्या था, कौन कोना था जिधर से तालियों की आवाज़ नहीं आ रही थी और सुभाषबाबू के जयकारे नहीं लग रहे थे ।

मई 09, 2010

बेसन की सोंधी रोटी

बेसन की सोंधी रोटी पर
खट्टी चटनी-जैसी माँ
याद आती है चौका बासन
चिमटा, फुकनी जैसी माँ

बान की खुर्रि खाट के ऊपर
हर आहट पर कान धरे
आधी सोई आधी जागी
थकी दोपहरी जैसी माँ

चिड़ियों की चहकार में गूँजे
राधा-मोहन, अली-अली
मुर्गे की आवाज से खुलती
घर की कुंडी जैसी माँ

बीवी,बेटी,बहन,पड़ोसन
थोड़ी-थोड़ी-सी सब में
दिन भर एक रस्सी के ऊपर
चलती नटनी जैसी माँ

बाँट के अपना चेहरा, माथा
आँखें जाने कहाँ गई
फटे पुराने एक अलबम में
चंचल लड़की जैसी माँ
                              - निदा फ़ाज़ली

मई 06, 2010

जाना खुदा के पास है

के.के.दत्ता की एक किताब है, WRITINGS AND SPEECHES OF GANDHI JI RELATING TO BIHAR : FROM 1917-1947 . कुछ दूसरी चीजें तलाशते हुए यह  किताब दिख गयी, उलट-पुलट कर देखा तो सबसे पहले इसमें जगह पाई तस्वीरों ने अपना ध्यान खिंचा. इस किताब में कई तस्वीरें डाली गयी हैं. पुस्तक के अंतिम पृष्ठों में गांधीजी की कई तस्वीरें हैं. १९४७ में पटना के मसौढ़ी थाने के दंगा प्रभावित क्षेत्रों  में घूमते हुए, जनसमूह को संबोधित करते हुए. मसौढ़ी अब अनुमंडल है. सन ४७  में यह दंगों के कारण चर्चा में आया था. यों पिछले तीन दशकों से यह नक्सली गतिविधियों के लिए विशेष चर्चित रहा है. 'छह इंच छोटा कर देना' यहाँ का चलता हुआ और ख्यात मुहावरा है. कस्बाई रंगत वाला यह क्षेत्र तकनीक, मोबाइल और ऐसी तमाम चीजों से जुड़े होने पर भी शहरों की आबो-हवा से अधिक गंवई पहचान को बनाये रखने में अधिक यकीन रखता है. पटना और जहानाबाद के लगभग बीच में स्थित  मसौढ़ी की यह पहचान कितने दिनों तक बची और बनी रहती है, यह देखना है ....  ..

 गाँधी के साथ तस्वीरों में 'सीमांत गाँधी' खान अब्दुल गफ्फार खाँ  और प्रो.अब्दुल बारी प्रमुखता से दिखाई पड़ते हैं.  बिहार में हो रहे दंगों की  भयावहता सुन-जान गाँधी यहाँ आए थे,या कहें कि बुलाए गए थे. सुबह की प्रार्थना करते और फिर दिन भर वे पटना के आस-पास के इलाकों में घूमते रहते थे. यहाँ दंगों के नेपथ्य की चर्चा नहीं करूंगा, वह किसी और दिन. यहाँ तो गाँधी की बात होगी और उसी बहाने कुछ दूसरी चीजें. मसौढ़ी तो मसौढ़ी पटना का गाँधी मैदान इससे पहले 'गाँधी मैदान' नहीं कहलाता था. गाँधी की प्रार्थनाओं और सभाओं ने इसे 'गाँधी मैदान' बना दिया. पटना का 'गाँधी मैदान' इससे पहले 'लॉन' कहलाता था. जगह- जगह भटकते हुए, दंगों की आग और पीड़ा अपने कलेजे पर महसूस कर और अपने भर पीड़ितों के दुख  को कम कर गाँधी शाम को फिर पटना आ जाते. इन दंगों की पहली जानकारी मुझे सफ़दर सर (प्रो. सफ़दर इमाम कादरी) से मिली थी, उन्हीं दिनों मैंने गाँधी को समझने की पहली कोशिश  की थी, किताबों और उनमें दर्ज 'इतिहास' से अलग. (यह चर्चा फिर कभी, अभी मसौढ़ी की बात.) के.के. दत्ता की किताब ने इतिहास के इस अध्याय को तनिक निकट से देखने और जानने के लिए उकसाया.
मसौढ़ी की बात किससे पूछता, किस किताब में ढूंढ़ता, वह किताब जो ४७ के पन्नों से मसौढ़ी के दुःख और पीड़ा और छटपटाहट और उजड़ने को सामने ले आये. धरती के इस कोने में खड़े गाँधी की बेचैनी को सामने ले आये !    
रामबुझावन बाबू (प्रो. रामबुझावन सिंह) से जब यह प्रसंग छेड़ा तो जिसकी उम्मीद थी वही हुआ, पन्ने पलटे तो जो सुना वही सुनाने की कोशिश कर रहा हूँ.
(प्रो. रामबुझावन सिंह;  घर मसौढ़ी, सौ में दस कम यानी नब्बे; इतने ही वर्षों से वे इस दुनिया को देखते आ रहे हैं. और उनकी आँखों में जीवन इतना भरा है कि इतने और वर्षों की यात्रा अभी भी मजे से की जा सकती है, न जाने कितनी पीढ़ियों ने उन्हें देखा और उनसे पढ़ा है, आज के दिन देश  के  संभवतः सबसे बुजुर्ग शिक्षक. अभी बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् के निदेशक हैं. रामबुझावन बाबू स्मृतियों के कोष हैं, कोशिश करूंगा कि आगे भी उनसे कुछ पाकर आपसे साझा कर सकूं.)
मैं तब दरभंगा के सी. एम. कॉलेज में था. मसौढ़ी की खबर सुनकर चल पड़ा, सोनपुर के पहलेजा में जहाज पकड़ा. जहाज खुलने वाला था, छलांग लागाकर पकड़ा. पर यह क्या, जहाज पर कोई सवारी नहीं थी सिवाए मेरे. डर लगा. कब क्या हो जाए. कुछ अनहोनी न हो  जाये यह सोचते हुए मन कांपता रहा. क्रूज के लोग कुछ कर न डालें यह सोच उन्हीं के पास हो लिया, उनसे पूछा कि और सवारी कहाँ हैं तो जवाब मिला- जानते नहीं है, कैसा माहौल है. जब जहाज उतरा तो पटने में रात के सन्नाटे के अलावे भी कुछ और था. उस अन्धकार में खौफ घुला था. रात अपने मौसेरे भाई के यहाँ टिककर सुबह मसौढ़ी पंहुचा. और मसौढ़ी का दृश्य मत पूछो. घृणा और हिंसा के खेल के बाद वहां गाँधी पहुँच चुके थे. सुबह में प्रार्थनाएं होती थीं, उनके सन्देश होते थे.
 मसौढ़ी में जम कर दंगे हुए थे, बंगाल का बदला लिया गया था.  हिंसा ऐसी कि उसकी याद भी रूह कँपा दे, लोग गांवों से भाग रहे थे. पर भाग कहाँ पाते थे उससे पहले ही अपनी जान गँवा देते थे. मसौढ़ी रेलवे का पश्चिमी प्लेटफ़ॉर्म लाशों से पट गया था. अपने घरों और गांवों को छोड़ने वाले मसौढ़ी को नहीं छोड़ पाए. जो लाशें बिछीं उनमें आधे को जला भी दिया गया ताकि मामला बराबरी का दिखे. कितनी लाशें मोरहन में बहा दी गईं, मोरहन का पानी लाल हो गया. कौए उसमें बहती लाशों पर बैठे रहते थे, ऐसी मार-काट मची थी.
जान लेने के लिए कई तरीके अपनाए गए, लोग भाग कर मसौढ़ी स्टेशन पहुँचते थे पर उन्हें यहाँ से जाने नहीं दिया जाता था. स्टेशन के पास ही एक जमींदार का चावल मिल था, उसमें एक भोंपू (सायरन) लगा था. जब लोग स्टेशन पर इकट्ठे हुए तो यह बज उठा, पर इसकी आवाज़ हमेशा से अलग थी. इसमें कुछ अलग सन्देश था. दंगाई जुट गए और लोग मारे गए. अपने घरों से उजड़ कर आए लोग जान बचाने के लिए एक कमरे में बंद हो गए और लोग इतने, कि कमरे में हवा भी नहीं अट सकती थी. कमरे को उन्होंने अन्दर से बंद कर लिया. अब लोग बाहर कैसे आएं, मारनेवालों के सामने यह समस्या थी, दरवाज़ा बंद था,  उसे कैसे खुलवाया जाए. तब किरोसिन में कपड़े भिंगोकर जलाकर कमरे में ऊपर से डाले गए, और इस तरह दरवाज़ा खुल गया. और लोग....
गाँधी मसौढ़ी पहुँच गए थे. लोग अपने गाँव, कब्र में दफन पुरखों की हड्डियाँ छोड़ कर जा रहे  थे. गाँधी किसे रोकते, जब कोई रुकनेवाला ही नहीं था. बस यही पूछते थे, कहाँ घर है. कहाँ जाओगे ? जवाब मिलता- पश्चिमी पाकिस्तान. वे सिर भी नहीं उठाते थे. झुके हुए माथे से, बस यही एक ठहरी हुई आवाज़ किसी तरह निकल पाती थी- कहाँ  घर है. कहाँ जाओगे ? वे किसे रोकते और भला क्यों ? गांधीजी के सामने हजरत साईं गाँव के लोग खड़े थे. सवाल वही था- कहाँ जाओगे ? जो उत्तर मिलता उसे सरकारी अमला लिखता जाता. पर सिर्फ लिखता ही जाता था, गाँधी के भीतर तो कुछ टूटता,घटता जाता था. उन्होंने सवाल पुछा-कहाँ जाओगे ? जवाब मिला- खुदा मियां के घर ! गाँधी का झुका हुआ माथा उठा, सामने एक लम्बा, मजबूत कद काठी का, बड़ाहिल सा शख्स खड़ा था. मसौढ़ी की मिट्टी की तुर्शी उसके समूचे वजूद में घुली थी.यह अलग ही जवाब था जिसे गाँधी ने अब तक नहीं सुना था. वे देखते रहे. फिर पूछा- पर रहोगे कहाँ ? उसी अपने गाँव में, हजरत साईं में, जहाँ मेरे बाप-दादा की,सात पीढ़ियों की हड्डियाँ दफन हैं. जवाब मिला. गाँधी की आँखों में पहली बार चमक आई. पास खड़े खान अब्दुल गफ्फार खाँ की ओर ताका और इस जुबांदराज की पीठ ठोकते हुए कहा- शाबाश ! फिर क्या था, सिलसिला ही चल पडा, 'कहाँ जाओगे' के जवाब में अब शायद किसी ने ही कहा-पाकिस्तान. उस्मान मियाँ तो हीरो हो गए. गाँधी बुदबुदाते रहे, दुहराते रहे- रहना अपने गाँव में है, रहना अपने गाँव में है.
एस. डी. ओ. ने उस्मान मियाँ को अलग ला कर कहा, उस्मान साहब आप कहें तो बन्दूक का लाएसेंस आपको मिल जाए. उस्मान मियाँ ने टका सा जवाब दिया-जिन्हें दिया था उनकी जान बच गयी क्या ? अरे, जो गोतिए की तरह साथ में रहते आ रहे हैं उनसे जान न बची तो आपकी बन्दूक क्या जान बचाएगी ? रखिए अपना लाएसेंस और अपनी बन्दूक.
  
    

मई 04, 2010

'चाँद' से दो चिट्ठियाँ

'चाँद' हिंदी की एक चर्चित पत्रिका थी, साहित्यिक, सामाजिक और समकालीन राजनितिक विषय इसमें स्थान पाते थे, इसकी दृष्टि संकोचरहित थी. सुधारात्मक उत्साह के साथ यह देशोत्थान का लक्ष्य रखती थी. इसके 'मारवाड़ी' और 'फांसी' अंकों का ऐतिहासिक महत्त्व  है. पत्रिका के तेवर तो ऐसे थे कि वह प्रेमचंद को टिप्पणियों को  चुनौती देने में नहीं हिचकती थी.  १९२३ से इस पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ हुआ था, इलाहबाद से;  रामरख सिंह सहगल, महादेवी वर्मा आदि इसके सम्पादक रहे.
'चाँद' में सम्पादकीय टिप्पणियों और पाठकों के पत्रों के लिए भी स्थान था. सम्पादक पाठकों की समस्याओं पर सुझाव देते थे, समस्याएँ प्रायः पाठिकाओं की होती थीं. इसके साथ ही उसमें  कुछ ऐसे पत्र भी प्रकाशित होते थे, जो समाज  में स्त्रियों के हालात को बहुत तल्ख़ रूप में व्यक्त करते थे. यहाँ ऐसे दो पत्र प्रस्तुत हैं, पहला पत्र मई १९३० का है और दूसरा जून १९३० का.

अप्रैल 20, 2010

बेटी की विदाई

कवितायेँ जीने के लिए जरूरी हैं, दूसरों की नहीं कहता; पर अपने लिए तो यह बहुत बड़ी जरूरत है. राजेश जोशी की पहले पढ़ी एक कविता आज फिर पढ़ी, नया कुछ लगा ऐसा नहीं कहूँगा. हाँ! पुराना जरूर सिहर गया.
राजेश जोशी की कविताओं में स्वाद होता है, कई किस्म के स्वाद. वह मिश्री की तरह घुलती है और नमक की तरह जीवन बनकर भी. यह मेरी प्रिय कविताओं में एक है, यह आपको भी ठहरा देगी, इतना विश्वास है.

बेटी की विदाई
वे तीनों अलग अलग शहरों से चौथे दोस्त की बेटी के ब्याह में आये थे
और कई दिनों बाद इस तरह इकट्ठे हुए थे

इस समय जब दोपहर लगभग ढल रही थी
तीनों घर के सामने के पेड़ की छाँव में
बैठे हुए थे
और चौथे की बेटी की बिदाई हो रही थी

अभी कुछ देर पहले तक वे हंस रहे थे और आपस में बतिया रहे थे
अब चौथे की बेटी लगभग घर के दरवाज़े पर आ पहुंची थी
 और रस्म के अनुसार कोई मखाने और पैसे फेंक रहा था
 बेटी कभी माँ के और कभी भाई के गले लग कर
रो रही थी
चौथा उसे अपनी एक बांह के घेरे में लिया था
वह अपने को संयत रखने की भरसक कोशिश कर रहा था
पर उसके आँख की कोरें बार बार भीग जाती थीं
वह रूमाल को चश्मे के कोनों के पास लाकर
चुपके से उन्हें पोंछ लेता था
वह घर के सामने बैठे तीनों दोस्तों की ओर
देखने से बच रहा था

तीनों दोस्त एकाएक चुप से हो गए थे
जैसे अचानक उनकी सारी बातें ख़त्म हो गयी हों
इनमे से एक की बेटी का ब्याह दस दिन बाद था
और दूसरे की बेटी का ग्यारह दिन बाद
थोड़ी देर पहले दोनों इसी बात पर अफ़सोस कर रहे थे
कि वे शामिल नहीं हो पाएंगे एक दूसरे की बेटी के ब्याह में
तीसरे की बेटी अभी  कॉलेज में पढ़ रही थी

चौथे की बेटी लगभग घर की देहरी तक आ चुकी थी
तीनों दोस्त बीच बीच में चौथे की तरफ देखते थे
चौथा तीनों से अपनी आँख चुरा रहा था
 तीनों में जो सबसे ज्यादा अनुभवी था कह रहा था
कि अभी तो चौथा अपने को बहुत संभाले हुए है
लेकिन विदा के बाद इसे संभालना होगा

तीनों दोस्त चुप थे
और एक दूसरे से पाना रोना छिपा रहे थे
तीनों एक दूसरे से नज़र चुराते हुए किसी न किसी बहाने
चुपचाप पोंछ लेते थे बार बार भीग जाती
आँखों की कोरों को
चौथे की बेटी की बिदाई में देख रहे तीनों
अपनी बेटी को बिदा होते

तुमने देखा है कभी
बेटी के जाने के बाद का कोई घर ?

जैसे बिना चिड़ियों की सुबह
जैसे बिना तारों का आकाश

बेटियाँ इतनी एक सी होती हैं
कि एक की बेटी में दिखती है दूसरे को अपनी बेटी की शक्ल

चौथे की बेटी जब बैठ कर चली गयी कार में
तो लगा जैसे ब्रह्माण्ड में कोई आवाज़ नहीं बची

एकाएक अपनी उम्र लगी हम सबको ,
अपनी उम्र से कुछ ज्यादा.
                                 

अप्रैल 11, 2010

हार-जीत

अशोक वाजपेयी की गद्य-कविता ' हार-जीत ' हिंसा की संस्कृति को बेहद शांत रूप में उघारती है. यह कविता  ताकत , वर्चश्व  और हिंसा के संस्थानों के सच को सामने लाती है. यह युद्ध मात्र का सच प्रकट करती है, स्वाभाविक रूप से  इससे उसके  सम्बद्ध पक्षों का सच भी प्रकट हो जाता है.

वे उत्सव मना रहे हैं. सारे शहर में रौशनी की जा रही है. उन्हें बताया गया है कि
उनकी सेना और रथ विजय प्राप्त कर लौट रहे हैं. नागरिकों में से ज्यादातर को पता
नहीं है कि किस युद्ध में उनकी सेना और शासक गए थे, युद्ध किस बात पर था.
यह भी नहीं कि शत्रु कौन था पर वे विजयपर्व मनाने की तैयारी में व्यस्त हैं. उन्हें सिर्फ
इतना पता है कि उनकी सेना विजय हुई. उनकी से आशय क्या है यह भी स्पष्ट नहीं है :
किसकी विजय हुई सेना की, कि शासक की, कि नागरिकों की ? किसी के पास पूछने
का अवकाश नहीं है. नागरिकों को नहीं पता कि कितने सैनिक गए थे  और कितने
विजयी वापस आ रहे हैं. खेत रहने वालों की सूची अप्रकाशित है. सिर्फ एक बूढ़ा
मशकवाला है जो सड़कों को सींचते हुए कह रहा है कि हम एक बार फिर हार गए हैं
और गाजे बाजे के साथ जीत नहीं हार लौट रही है. उस पर कोइ ध्यान नहीं देता है
और अच्छा यह है कि उस पर सड़कें सींचने भर की जिम्मेवारी है, सच को दर्ज करने
या बोलने की नहीं. जिन पर है वे सेना के साथ ही जीतकर लौट रहे हैं.

अप्रैल 07, 2010

हिंसा और प्रतिहिंसा

नक्सली हिंसा में ७४ से अधिक सिपाहियों के मरने की कीमत कौन चुका सकता है, इसके बदले में १७४ 'माओवादियों' को मार गिरा कर क्या बदला लिया जा सकता है ! कैसे संभव है यह ? जब इस तरह जवानों की लाश गिरती है तो वह  केवल मातम या उत्सव का दिवस नहीं होता. क्या-क्या टूटता है इसे न गोलियां जानती हैं और न वे जो गोलियां पैदा करते हैं.
मोहन राकेश की एकांकी 'सिपाही की माँ' ऐसे मौके पर बहुत विचलित करने वाली रचना है. युद्ध मात्र की वास्तविकता और क्रूरता को जितनी बेचैनी, ठोस और मानवीय सरोकारों के साथ यह रचना दिखाती है, वह बेहद मार्मिक है. इसमें एक ऐसी माँ-बेटी की कहानी है जिनके घर का इकलौता बेटा, जिस पर माँ की और विवाह के योग्य बहन की उम्मीदें टिकी हैं, फौज में भरती हो जाता है और मोर्चे पर चला जाता है. उसकी माँ यह भी नहीं जानती कि बर्मा जहाँ उसका बेटा लड़ रहा है, उसके गाँव से कितनी दूर है. माँ और बेटी का जागना भी मानक के लिए है और सोना भी. प्रतीक्षा के लम्बे उदास दिनों से जूझतीं माँ बेटी का अकेलापन अभावों और चिंताओं का ठिकाना हो गया है.एकांकी का अंत विषादपूर्ण  है, एक दूसरा सिपाही भी है, वह मानक को मरना चाहता है और मानक उसे.
मानक और सिपाही में हम उन्हें पहचान सकते हैं, जो यह नहीं जानते की युद्ध किस बात पर है, हिंसा किसलिए है.
एकांकी के अंत से यह अंश पढ़िये...........

          सिपाही- इसकी (मानक की) किसी के साथ दुश्मनी नहीं है ?....यह देख (बटन खोल कर अपना लहू से तरबतर सीना दिखता है) ये सब घाव इसी के किए हुए है. मैं इन घावों से कब का मर चुका होता. लेकिन सिर्फ इसे मारने के लिए जिन्दा हूँ. इसे मारे बिना मैं नहीं मरूँगा .
    बिशनी- तू बात क्यों नहीं समझता ? मैं इसकी माँ हूँ. यह किसी दुश्मनी से लड़ाई में नहीं गया . इसे मैंने लड़ाई में भेजा था.... इसकी बहन अब ब्याहने जोग हो गयी है. छह महीने-साल में हमें उसका ब्याह करना है. हमारे घर की हालत बहुत ख़राब है. अगर लड़की के ब्याह की चिंता न होती तो हम लोग आधा पेट खाकर रह लेते पर मैं कभी इसे लड़ाई पर न भेजती. इस लड़के के सिवा घर में कोई कमानेवाला नहीं है. मैंने सोचा था कि लड़की ब्याही जाएगी तो फिर मैं इसे लड़ाई पर नहीं जाने दूँगी. फिर मैं इसका भी ब्याह कर दूँगी और इसे अपने पास घर में रखूंगी. मुझे क्या पता था कि लड़ाई में जाकर इसकी यह हालत हो जाएगी ? आज यह इस हाल में घर आया है. मैं आज इसे अपने से कैसे अलग कर सकती हूँ ?  इसकी जगह तू होता तो तेरी माँ तुम्हें  अपने से अलग होने देती ?
    सिपाही -  मेरी माँ...? ( जरा सा हंस कर)  मेरी माँ अब पागल हो गयी है. वह रोज मेरी मौत का इंतज़ार करती है. वह हंसकर कर कहती है कि  थोड़े दिनों में मेरे बेटे की लाश घर जाएगी. मेरी बीबी ने अभी से बेवा का स्वांग बना लिया है. उसने मुझे लिखा है कि जिस दिन वह मेरे मरने की खबर सुनेगी उस दिन गले में फांसी लगाकर मर जाएगी. उसके पेट में छह महीने का बच्चा है. उसके साथ ही वह भी मर जाएगा. (फिर से सीना खोलकर दिखता है.) और तेरे लड़के ने देख मेरा क्या हाल किया.....यह अभी भी मेरे खून का प्यासा है. इसकी आँखों को देख. इसकी आँखों में तुझे वहशियाना चमक दिखाई नहीं देती ?
     बिशनी - नहीं नहीं, इसकी आँखें ऐसी नहीं हैं. इस समय इसकी आँखें ऐसी लगती हैं. पर इनका असली रंग ऐसा नहीं है...........
   सिपाही - तू इसकी आँखों का रंग नहीं पहचानती. तू इसकी माँ है, पर तू इस रंग का मतलब नहीं जानती. इसकी आँखों में दुश्मन है. जब तक मैं सामने हूँ इसकी आँखों का रंग नहीं बदलेगा. देख, यह कैसे आँखों में खून भरकर मुझे देख रहा है.
               मानक सहसा अपने को झटककर उठ खड़ा होता है. वह सिपाही का गला दबाने के लिए उस पर झपटना चाहता है पर सिपाही झट से बन्दूक का कुंदा फिर तान देता है. बिशनी जल्दी से बन्दूक के कुंदे  के आगे जाती है.
   बिशनी - नहीं, तू इसे नहीं मरेगा. तुझे तेरी माँ की सौगंध, तू इसे नहीं मारेगा.
   सिपाही - मैं इसे नहीं मारूँगा तो यह मुझे मार देगा. तो यही चाहती है ?
   बिशनी - नहीं यह तुझे नहीं मारेगा. मै इसकी माँ हूँ. मैं इसे जानती हूँ, यह तुझे कभी नहीं मारेगा.
   मानक - (वीभत्स स्वर में) मैं इसे नहीं मारूँगा ? (रौद्र भाव से आगे बढ़ता हुआ) नहीं ! मैं इसे जरूर मारूँगा, मैं अभी इसके टुकड़े-टुकड़े कर दूंगा.
             आगे बढ़कर सिपाही को धक्का देता है जिससे वह लड़खड़ाकर पीछे गिर जाता है और बन्दूक उठा लेता है और उसका कुंदा सिपाही के सीने की ओर तान देता है.
             - मैं वहशी हूँ ! मैं जानवर हूँ ! मैं वहशी और जानवर से भी बढ़ कर हूँ. इस तरह मेरी तरफ क्यों देख रहा है ? उठ, उठकर मुझे ठोकर लगा....
             उसी तरह हँसता है जैसे वह सिपाही हंस रहा था. बिशनी जल्दी से बन्दूक के कुंदे के सामने आ जाती है.
बिशनी - नहीं मानक, तू इसे नहीं मारेगा ! यह भी हमारी तरह गरीब आदमी है. इसकी माँ इसके पीछे रो-रोकर पागल हो गयी है. इसके घर में बच्चा होनेवाला है. यह मर गया तो इसकी बीवी फांसी लगाकर मर जाएगी....
                    मानक बिशनी को झटककर बीच में से हटा देता hai
 मानक -  मैं इसे नहीं छोडूंगा. यह दुश्मन है. मैं इसको अभी मार दूंगा, अभी. यहीं....
बिशनी - नहीं मानक, तू इसे नहीं मारेगा...
                  फिर बीच में आने का प्रयत्न करती है पर मानक उसे फिर झटककर हटा देता है. बिशनी चारपाई पर गिरकर हाथों में मुँह छिपा लेती है. सिपाही पार्श्व की ओर हटता है. मानक उसके साथ-साथ आगे बढ़ता है.
मानक - मैं इसे अभी मार दूंगा. अभी इसकी बोटी-बोटी अलग कर दूंगा.....
                  सिपाही और मानक की आकृतियाँ धीरे-धीरे पार्श्व में जाकर विलीन हो जाती हैं. बिशनी हाथों में मुँह छिपाए हुए चिल्ला उठती है.
बिशनी - मानक ! मानक !
                 एक साथ चार - छह गोलियां चलने और उसके साथ सिपाही के कराहने का शब्द सुनाए देता है. सहसा खामोशी छा जाती है. बिशनी उसी तरह चिल्लाती है : मानक ! मानक ! मुन्नी जल्दी से करवट बदलकर उठ बैठती है.
मुन्नी - (घबराए हुए स्वर में) माँ !
बिशनी - (उसी तरह) मानक !
               मुन्नी जल्दी से उठकर ढिबरी जला देती है. प्रकाश का रंग हलके नीले से फिर पीला हो जाता है. मुन्नी बिशनी की चारपाई  पर जा बैठती है.
मुन्नी - क्या बात है, माँ ?
               बिशनी आँखों से हाथ हटाकर, चुन्धिआई सी नज़रों से चारों ओर देखती है.
बिशनी - (कुछ खोजती सी) मानक !
मुन्नी - तुम रोज़ भैया के ही सपने देखती हो, माँ ? मैंने तुमसे कहा था, अगले मंगल को भैया की चिट्ठी जरूर आएगी.
बिशनी - (जैसे आत्मगत) चिट्ठी आएगी ?.....और वह आप...?
मुन्नी - थोड़े दिनों में भैया आप भी आएँगे. तुम आप ही कहती थीं  कि वे जल्दी आएँगे और मेरे लिए कड़े और चूड़ियां लायेंगे......
बिशनी - कड़े और चूड़ियां ?........ ओ मुन्नी !
             उसे अपने साथ सटा लेती है और आँखों से ताप-ताप पानी बरसने लगता है.
मुन्नी - भैया मेरे लिए जो कड़े लायेंगे, वे तारो और बंतो के कड़ों से भी अच्छे होंगे न, माँ ?
               बिशनी आँखें बंद करके नकारात्मक भाव से सिर हिलती है पर शीघ्र ही पाने को संभाल लेती है.
बिशनी - हाँ बेटी, तेरे कड़े सबके कड़ों से अच्छे होंगे.
मुन्नी - सुच्चे मोतियों के कड़े होंगे न, माँ ?
बिशनी - हाँ बेटी, सुच्चे मोतियों के कड़े.....
              उसका माथा चूमकर उसे अलग हटा देती है.
           - अब सो जा, अभी बहुत रात बाकी है.
                 मुन्नी अपनी चारपाई पर चली जाती है. बिशनी उठकर ढिबरी बुझा देती है. उसके ढिबरी बुझाते ही गहरा अँधेरा छा जाता है. अँधेरे में बिशनी के बुदबुदाने का स्वर सुनाई देता है.
           -            ताती वा ना लगाई, पार ब्रह्म सहाई.
                        राखनहारे रखिया, प्रभु व्याधि मिटाई.....

अप्रैल 01, 2010

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
शुक्लजी की आलोचना और इतिहास दृष्टि की कई विशेषताएँ गिनाई जा सकती हैं. इस पोस्ट में ऐसा कुछ नहीं किया जाएगा. हम ले चलेंगे आपको 'माधुरी' के पन्नों पर. माधुरी के वर्ष १३, खंड ६ संख्या १, में 'सम्पादकीय विचार' में शुक्लजी को  'हिंदी साहित्य सम्मलेन'  का सभापति बनाने के सम्बन्ध में चर्चा थी, इस चर्चा का महत्त्व अपनी जगह पर,  सबसे पहले जो चीज ध्यान खींचती है वह है शुक्लजी की तस्वीर. आप भी देखिए---


टिप्पणी यह थी....
"हमने गत संख्या में महात्माजी के हिंदी साहित्य सम्मलेन के इंदौर में होनेवाले अधिवेशन का सभापति चुने जाने का संवाद प्रकाशित कर इस उत्कृष्ट चुनाव के सम्बन्ध में हर्ष प्रकट किया था. पर हमें खेद है कि यह समाचार गलत निकला. हिंदी पत्रों में किसी ने यह गलत समाचार छपा दिया था. अब मालूम हुआ है कि इंदौर साहित्य सम्मलेन के कार्यकर्ताओं ने पूज्यपाद मदनमोहन जी मालवीय को सभापति चुना है और मालवीय जी ने इस शर्त पर उनकी प्रार्थना स्वीकार भी कर ली है कि अधिवेशन तक अगर उनका स्वास्थ्य ठीक रहा अथवा कुछ राजनीतिक कारणों से उन्हें विलायत न  जाना पड़ा तो वह अवश्य सभापति पद को अलंकृत करेंगे. इसमें संदेह नहीं कि मालवीयजी यदि सभापति हो सके तो सम्मलेन का सर्वोपरि सौभाग्य होगा. परन्तु हमारा ख्याल है कि मालवीयजी का स्वास्थ्य यदि ठीक रहा, ईश्वर करे, ऐसा ही हो- तो वह विलायत अवश्य जायेंगे. इसलिए उनके सभापति बन सकने की सम्भावना बहुत कम है. ऐसी परिस्थिति में सम्मलेन के लिए फिर सभापति का निर्वाचन अनिवार्य हो जाएगा. यदि ऐसा हो तो हम सम्मलेन के कर्णधारों के आगे पुनः काशी के पंडित रामचंद्र शुक्ल का नाम उपस्थित करना अपना कर्तव्य समझते हैं. शुक्लजी कितने बड़े अंग्रेजी और हिंदी साहित्य के विद्वान हैं, भाषा विज्ञान के कितने बड़े आचार्य हैं, समालोचना करने में कितने दक्ष हैं, उनका अध्ययन कितना गंभीर और विशाल है, यह अभी साधारण हिंदी पाठक शायद नहीं जानते. इसका कारण यही है कि आप आत्म-विज्ञापन से कोसों दूर रहकर साधना में लगे रहते हैं. आपने हिंदी साहित्य के उत्थान और अभ्युदय के लिए जो कुछ किया है, उसका मूल्य बहुत अधिक है. हमारी तो दृढ़ धारणा है कि अकेले शुक्लजी ने जितनी हिंदी सेवा की है उतनी हिंदी के दस-बीस धुरंधर सम्राटों ने भी मिलकर न की होगी. आपने जायसी, तुलसी और सूर की रचनाओं पर जो प्रकाश डाला है वह अद्भूत, अभूतपूर्व और अनवद्य है. आप अंग्रेजी और हिंदी के ही नहीं, संस्कृत, फारसी और बंग्ला के भी अच्छे ज्ञाता हैं. ऐसे विद्वान की अधिक समय तक उपेक्षा करना सम्मलेन और हिंदी-भाषी जनता, दोनों के लिए लज्जाजनक और मूर्खता का परिचायक होगा. हम जानते हैं कि शुक्लजी इस सम्मान के लिए लालायित नहीं हैं.पर हमारा भी तो कुछ कर्त्तव्य है. सम्मलेन के सभापति-पद से शुक्लजी का नहीं, बल्कि शुक्लजी के सभापतित्व से सम्मलेन का गौरव बढ़ेगा. हमें आशा है सम्मलेन के कर्णधार और हिन्दीप्रेमी जनता हमारी इन पंक्तियों पर अवश्य ध्यान देगी. हमारी उपेक्षा से ही सम्मलेन स्व. पंडित बालकृष्ण जी भट्ट पूज्यपाद आचार्य द्विवेदीजी - जैसे सुयोग्य विद्वानों का सम्मान करने के सौभाग्य से वंचित हो चुका है.सम्मलेन के कर्णधारों को पहले अधिकारियों की ओर दृष्टिपात करना चाहिए. इसी से सम्मलेन का गौरव बढ़ेगा और साहित्य की भी श्रीवृद्धि होगी. अधिक प्रसिद्धि की अपेक्षा ठोस काम और साहित्य-सेवा पर ही सभापति की चुनाव में ध्यान देना चाहिए.
शुक्लजी को नमन.

   

मार्च 27, 2010

नदियाँ रोती हैं

नदियाँ रोती हैं
केदारनाथ सिंह के संकलन 'उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ' में 'नदियाँ' शीर्षक से एक कविता संकलित है.  मार्च महीने के इस तीसरे शनिवार को 'अर्थ आवर' मनाते हुए यह कविता कुछ बेहद ही मार्मिक, चिंतनीय और जरूरी सवाल खड़ा करती है. 
धरती की तबियत ठीक नहीं है, और बिगडती ही जा रही है, कोई मानने वाला ही नहीं है कि यह  दुनिया अब उतनी जिन्दा नहीं रह गयी है. केदारजी की यह कविता आसान नहीं है, पर; कविता से पहले नदियों से भेंट कर लें.

अकबर ने बीरबल से पूछा कि बताओ किस दरिया का पानी सबसे अच्छा है,बीरबल ने जवाब दिया-यमुना का. अकबर को अचरज हुआ. पूछा तुमने गंगा का नाम क्यों नहीं लिया. बीरबल ने कहा-जहाँपनाह, पानी तो यमुना का ही अच्छा है. तो गंगा का क्या है- अकबर ने पूछा .  बीरबल ने जवाब दिया-गंगा का पानी पानी थोड़े ही है, वह तो अमृत है.
पता नहीं कैसा पानी होगा वह, जिसके लिए अकबर और बीरबल के मन में इतना सम्मान था. वह कैसा पानी रहा होगा जिसके किनारे विद्यापति ने 'सुख सार' पाया था. पता नहीं.
हमने तो जो गंगा कानपुर,बनारस, पटना और भागलपुर में देखी है उसे देखकर तो यही सवाल उठा है कि 'क्या तुम ही गंगा हो'. माँ गंगा.
हाजीपुर, मेरा शहर. दो नदियों की गोद में बसा हुआ, दक्षिण में गंगा और पश्चिम में गंडक. दोनों का सम्बन्ध विष्णु से. दोनों के मिलन पर ही है 'हरिहरक्षेत्र'.
पर गंगा मर गयी है, मन को बहलाने के लिए भले कह लें कि अभी मरी नहीं है. पर सचाई येही है कि उसकी साँसे अब बाकि नहीं हैं .
गंडक का हाल भी इससे जुदा नहीं है, ये दोनों देव नदियाँ कहीं और नहीं इसी 'देवभूमि' में प्राण त्याग रही हैं.
ये बड़ी नदियाँ हैं, ऐसी छोटी नदियों की गिनती तो इस देश में हजारों में जाएगी.
नदियाँ मर रही हैं, कचड़ों से, नालों से, बांधों से, पुलों से और हम से. पटना और हाजीपुर के बीच गंगा पर महात्मा गाँधी सेतु है. लगभग ६ किलोमीटर लम्बा. विशाल, ज्यादा पुराना नहीं है, ३० साल भी नहीं हुए हैं इसके अभी. इस पर से कभी गुजरें तो यह पुल राजनेताओं और ठीकेदारों के भाईचारे और अपनी मजबूती की कहानियां सुनाता हुआ मिल जाएगा. अगर पहली बार जा रहे हों और फ़र्ज़ कीजिये कि जाम की वजह से पैदल चलना पर जाये, तो दिल दहल जाएगा आपका.
पता नहीं गंगा पर क्या गुजरती होगी तब.
पुल से गंगा को देखिये वह निचुड़ी और थकी दिखेगी, बिखड़ी हुई, बँटी हुई, रेत ही रेत. बड़े ट्रक उसके सीने पर दौड़ते जाते हैं, खुली दौड़ है, बालू नहीं सोना है गंगा की पेट में. 
पर वह मर गयी है, पानी सड़ गया है, बहता नहीं है. पटना की गंगा के पानी को एक बार देख लीजिये.
कुछ और भी तस्वीरें   गंगा     वह रेत की नदी भर है अब. 





गंडक गंगा से कुछ अलग मन मिजाज की नदी है,जगदीशचन्द्र माथुर का गंडक पर अद्भूत निबंध है 'ओ सदानीरा'.समूचे उत्तर बिहार की नदी-संस्कृति को समझने में अत्यंक ही सहायक. गंडक कभी वेगवती थी, उसे अब 'सदानीरा' कहना ठीक नहीं. वह सूख गयी है, कुछ मीटर का फासला छोड़ दें तो इसे पैदल पार किया जा सकता है.गंडक के एक किनारे पर हाजीपुर है और दूसरे किनारे पर सोनपुर. फासला लगभग १  किलोमीटर का. दोनों शहरो के बीच अभी तीन पुल खड़े हैं सबसे पुराना पुल अंग्रेजी राज का है, १०० साल से भी पुराना.यह पहले रेल पुल था.जो अब सड़क पुल के रूप में है.
दूसरा पुल रेल पुल है,लगभग आधी शताब्दी का,तीसरा पुल लगभग दो दशक पुराना, चौथा पुल अभी बन रहा है,तस्वीर में दिख जाएगा.





पुल नदियों पर खड़े हैं,केदारजी की ही एक चर्चित कविता है 'मांझी का पुल'.यह पुल बिहार और उत्तरप्रदेश को जोड़ता है. घाघरा नदी पर बने इस पुल को कभी केदार जी ने पंख फैलाये सारस के डैनों की तरह देखा था.यह १९८० की कविता है .समय वाकई बहुत-बहुत जल्द बदल गया...या बदल दिया गया ?

नदियाँ मर रही हैं, रोज, रोनेवाला कौन है ?

नदियाँ
वे हमें जानती हैं
जैसे जानती हैं वे अपनी मछलियों की बेचैनी
अपने तटों का तापमान
जो कि हमीं हैं

बस हमीं भूल गए हैं
हमारे घर कभी उनका भी
आना-जाना था

उनकी नसों में बहता है
पहाड़ों का खून
जिसमे थोड़ा सा खून
हमारा भी शामिल है
और गरम-गरम दूध
टपकता हुआ भूरे दरख्तों की छाल से

पता लगा लो
दरख्तों की छाल
और हमारी त्वचा का गोत्र
एक ही है

परछाइयां भी असल में
नदियाँ ही हैं
हमीं से फूटकर
हमारी बगल में चुपचाप बहती हुई नदियाँ
हर आदमी अपनी परछाईं में 
नहाता है
और लगता है
नदी में नहा रहा है

जो लगता है वह भी
उतना ही सच है
जितना कोई भी नदी

पुल-
पृथ्वी  के सारे के सारे पुल
एक गहरा षड्यंत्र हैं नदियों के खिलाफ
और नदियाँ उन्हें इस तरह बर्दाश्त करती हैं
जैसे कैदी जंजीरों को
हालांकि  नदियाँ इसीलिए नदियाँ है
कि वे जब भी चाहती हैं
उलट-पुलट आर देती हैं सारा कैलेण्डर
और दिशाओं के नाम

हमारे देश में नदियाँ
जब कुछ नहीं करतीं
तब वे शवों का इंतजार करती हैं

अँधेरे को चीरते हुए
आते हैं शव
वे आते हैं अपनी चुप्पियों की चोट से
जीने की धार को तीव्रतर करते हुए

नदियाँ उन्हें देखती हैं
और जैसे चली जाती हैं कही अपने ही अन्दर
किन्हीं जलमग्न  शहरों की
गंध की तलाश में

नदियाँ जोकि असल में
शहरों का आरम्भ हैं
और शहर जोकि असल में
नदियों का अंत

मुझे याद नहीं
मैंने भूगोल की किस किताब में पढ़ा था
अंत और आरम्भ
अपने विरोध की सारी ऊष्मा के साथ
जिस जगह मिलते हैं 
कहीं वहीँ से निकलती हैं
सारी की सारी नदियाँ. ....