मार्च 27, 2010

नदियाँ रोती हैं

नदियाँ रोती हैं
केदारनाथ सिंह के संकलन 'उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ' में 'नदियाँ' शीर्षक से एक कविता संकलित है.  मार्च महीने के इस तीसरे शनिवार को 'अर्थ आवर' मनाते हुए यह कविता कुछ बेहद ही मार्मिक, चिंतनीय और जरूरी सवाल खड़ा करती है. 
धरती की तबियत ठीक नहीं है, और बिगडती ही जा रही है, कोई मानने वाला ही नहीं है कि यह  दुनिया अब उतनी जिन्दा नहीं रह गयी है. केदारजी की यह कविता आसान नहीं है, पर; कविता से पहले नदियों से भेंट कर लें.

अकबर ने बीरबल से पूछा कि बताओ किस दरिया का पानी सबसे अच्छा है,बीरबल ने जवाब दिया-यमुना का. अकबर को अचरज हुआ. पूछा तुमने गंगा का नाम क्यों नहीं लिया. बीरबल ने कहा-जहाँपनाह, पानी तो यमुना का ही अच्छा है. तो गंगा का क्या है- अकबर ने पूछा .  बीरबल ने जवाब दिया-गंगा का पानी पानी थोड़े ही है, वह तो अमृत है.
पता नहीं कैसा पानी होगा वह, जिसके लिए अकबर और बीरबल के मन में इतना सम्मान था. वह कैसा पानी रहा होगा जिसके किनारे विद्यापति ने 'सुख सार' पाया था. पता नहीं.
हमने तो जो गंगा कानपुर,बनारस, पटना और भागलपुर में देखी है उसे देखकर तो यही सवाल उठा है कि 'क्या तुम ही गंगा हो'. माँ गंगा.
हाजीपुर, मेरा शहर. दो नदियों की गोद में बसा हुआ, दक्षिण में गंगा और पश्चिम में गंडक. दोनों का सम्बन्ध विष्णु से. दोनों के मिलन पर ही है 'हरिहरक्षेत्र'.
पर गंगा मर गयी है, मन को बहलाने के लिए भले कह लें कि अभी मरी नहीं है. पर सचाई येही है कि उसकी साँसे अब बाकि नहीं हैं .
गंडक का हाल भी इससे जुदा नहीं है, ये दोनों देव नदियाँ कहीं और नहीं इसी 'देवभूमि' में प्राण त्याग रही हैं.
ये बड़ी नदियाँ हैं, ऐसी छोटी नदियों की गिनती तो इस देश में हजारों में जाएगी.
नदियाँ मर रही हैं, कचड़ों से, नालों से, बांधों से, पुलों से और हम से. पटना और हाजीपुर के बीच गंगा पर महात्मा गाँधी सेतु है. लगभग ६ किलोमीटर लम्बा. विशाल, ज्यादा पुराना नहीं है, ३० साल भी नहीं हुए हैं इसके अभी. इस पर से कभी गुजरें तो यह पुल राजनेताओं और ठीकेदारों के भाईचारे और अपनी मजबूती की कहानियां सुनाता हुआ मिल जाएगा. अगर पहली बार जा रहे हों और फ़र्ज़ कीजिये कि जाम की वजह से पैदल चलना पर जाये, तो दिल दहल जाएगा आपका.
पता नहीं गंगा पर क्या गुजरती होगी तब.
पुल से गंगा को देखिये वह निचुड़ी और थकी दिखेगी, बिखड़ी हुई, बँटी हुई, रेत ही रेत. बड़े ट्रक उसके सीने पर दौड़ते जाते हैं, खुली दौड़ है, बालू नहीं सोना है गंगा की पेट में. 
पर वह मर गयी है, पानी सड़ गया है, बहता नहीं है. पटना की गंगा के पानी को एक बार देख लीजिये.
कुछ और भी तस्वीरें   गंगा     वह रेत की नदी भर है अब. 





गंडक गंगा से कुछ अलग मन मिजाज की नदी है,जगदीशचन्द्र माथुर का गंडक पर अद्भूत निबंध है 'ओ सदानीरा'.समूचे उत्तर बिहार की नदी-संस्कृति को समझने में अत्यंक ही सहायक. गंडक कभी वेगवती थी, उसे अब 'सदानीरा' कहना ठीक नहीं. वह सूख गयी है, कुछ मीटर का फासला छोड़ दें तो इसे पैदल पार किया जा सकता है.गंडक के एक किनारे पर हाजीपुर है और दूसरे किनारे पर सोनपुर. फासला लगभग १  किलोमीटर का. दोनों शहरो के बीच अभी तीन पुल खड़े हैं सबसे पुराना पुल अंग्रेजी राज का है, १०० साल से भी पुराना.यह पहले रेल पुल था.जो अब सड़क पुल के रूप में है.
दूसरा पुल रेल पुल है,लगभग आधी शताब्दी का,तीसरा पुल लगभग दो दशक पुराना, चौथा पुल अभी बन रहा है,तस्वीर में दिख जाएगा.





पुल नदियों पर खड़े हैं,केदारजी की ही एक चर्चित कविता है 'मांझी का पुल'.यह पुल बिहार और उत्तरप्रदेश को जोड़ता है. घाघरा नदी पर बने इस पुल को कभी केदार जी ने पंख फैलाये सारस के डैनों की तरह देखा था.यह १९८० की कविता है .समय वाकई बहुत-बहुत जल्द बदल गया...या बदल दिया गया ?

नदियाँ मर रही हैं, रोज, रोनेवाला कौन है ?

नदियाँ
वे हमें जानती हैं
जैसे जानती हैं वे अपनी मछलियों की बेचैनी
अपने तटों का तापमान
जो कि हमीं हैं

बस हमीं भूल गए हैं
हमारे घर कभी उनका भी
आना-जाना था

उनकी नसों में बहता है
पहाड़ों का खून
जिसमे थोड़ा सा खून
हमारा भी शामिल है
और गरम-गरम दूध
टपकता हुआ भूरे दरख्तों की छाल से

पता लगा लो
दरख्तों की छाल
और हमारी त्वचा का गोत्र
एक ही है

परछाइयां भी असल में
नदियाँ ही हैं
हमीं से फूटकर
हमारी बगल में चुपचाप बहती हुई नदियाँ
हर आदमी अपनी परछाईं में 
नहाता है
और लगता है
नदी में नहा रहा है

जो लगता है वह भी
उतना ही सच है
जितना कोई भी नदी

पुल-
पृथ्वी  के सारे के सारे पुल
एक गहरा षड्यंत्र हैं नदियों के खिलाफ
और नदियाँ उन्हें इस तरह बर्दाश्त करती हैं
जैसे कैदी जंजीरों को
हालांकि  नदियाँ इसीलिए नदियाँ है
कि वे जब भी चाहती हैं
उलट-पुलट आर देती हैं सारा कैलेण्डर
और दिशाओं के नाम

हमारे देश में नदियाँ
जब कुछ नहीं करतीं
तब वे शवों का इंतजार करती हैं

अँधेरे को चीरते हुए
आते हैं शव
वे आते हैं अपनी चुप्पियों की चोट से
जीने की धार को तीव्रतर करते हुए

नदियाँ उन्हें देखती हैं
और जैसे चली जाती हैं कही अपने ही अन्दर
किन्हीं जलमग्न  शहरों की
गंध की तलाश में

नदियाँ जोकि असल में
शहरों का आरम्भ हैं
और शहर जोकि असल में
नदियों का अंत

मुझे याद नहीं
मैंने भूगोल की किस किताब में पढ़ा था
अंत और आरम्भ
अपने विरोध की सारी ऊष्मा के साथ
जिस जगह मिलते हैं 
कहीं वहीँ से निकलती हैं
सारी की सारी नदियाँ. .... 


  
                                                                                                      

5 टिप्‍पणियां:

Bihari jee ने कहा…

ek achhe lekhak hone ke sath ap ek achhe photographer bhi hain

Udan Tashtari ने कहा…

मनमोहक तस्वीरें और उम्दा प्रस्तुति!

Kulwant Happy ने कहा…

काबिलेतारीफ रचना।

Shekhar kumawat ने कहा…

yahi durbhagya he hamare desh ka

jaha nadiyon ko ma ke rup me dekha jata he waha ye hal he


http://kavyawani.blogspot.com/

shekhar kumawat

Akhilesh ने कहा…

mere pas kuch kahne ko shabd hi nahi hai. bas itna hi kah sakta hu ki apki rachna bahut achhi hai. bole to jhakkasss.