अप्रैल 20, 2010

बेटी की विदाई

कवितायेँ जीने के लिए जरूरी हैं, दूसरों की नहीं कहता; पर अपने लिए तो यह बहुत बड़ी जरूरत है. राजेश जोशी की पहले पढ़ी एक कविता आज फिर पढ़ी, नया कुछ लगा ऐसा नहीं कहूँगा. हाँ! पुराना जरूर सिहर गया.
राजेश जोशी की कविताओं में स्वाद होता है, कई किस्म के स्वाद. वह मिश्री की तरह घुलती है और नमक की तरह जीवन बनकर भी. यह मेरी प्रिय कविताओं में एक है, यह आपको भी ठहरा देगी, इतना विश्वास है.

बेटी की विदाई
वे तीनों अलग अलग शहरों से चौथे दोस्त की बेटी के ब्याह में आये थे
और कई दिनों बाद इस तरह इकट्ठे हुए थे

इस समय जब दोपहर लगभग ढल रही थी
तीनों घर के सामने के पेड़ की छाँव में
बैठे हुए थे
और चौथे की बेटी की बिदाई हो रही थी

अभी कुछ देर पहले तक वे हंस रहे थे और आपस में बतिया रहे थे
अब चौथे की बेटी लगभग घर के दरवाज़े पर आ पहुंची थी
 और रस्म के अनुसार कोई मखाने और पैसे फेंक रहा था
 बेटी कभी माँ के और कभी भाई के गले लग कर
रो रही थी
चौथा उसे अपनी एक बांह के घेरे में लिया था
वह अपने को संयत रखने की भरसक कोशिश कर रहा था
पर उसके आँख की कोरें बार बार भीग जाती थीं
वह रूमाल को चश्मे के कोनों के पास लाकर
चुपके से उन्हें पोंछ लेता था
वह घर के सामने बैठे तीनों दोस्तों की ओर
देखने से बच रहा था

तीनों दोस्त एकाएक चुप से हो गए थे
जैसे अचानक उनकी सारी बातें ख़त्म हो गयी हों
इनमे से एक की बेटी का ब्याह दस दिन बाद था
और दूसरे की बेटी का ग्यारह दिन बाद
थोड़ी देर पहले दोनों इसी बात पर अफ़सोस कर रहे थे
कि वे शामिल नहीं हो पाएंगे एक दूसरे की बेटी के ब्याह में
तीसरे की बेटी अभी  कॉलेज में पढ़ रही थी

चौथे की बेटी लगभग घर की देहरी तक आ चुकी थी
तीनों दोस्त बीच बीच में चौथे की तरफ देखते थे
चौथा तीनों से अपनी आँख चुरा रहा था
 तीनों में जो सबसे ज्यादा अनुभवी था कह रहा था
कि अभी तो चौथा अपने को बहुत संभाले हुए है
लेकिन विदा के बाद इसे संभालना होगा

तीनों दोस्त चुप थे
और एक दूसरे से पाना रोना छिपा रहे थे
तीनों एक दूसरे से नज़र चुराते हुए किसी न किसी बहाने
चुपचाप पोंछ लेते थे बार बार भीग जाती
आँखों की कोरों को
चौथे की बेटी की बिदाई में देख रहे तीनों
अपनी बेटी को बिदा होते

तुमने देखा है कभी
बेटी के जाने के बाद का कोई घर ?

जैसे बिना चिड़ियों की सुबह
जैसे बिना तारों का आकाश

बेटियाँ इतनी एक सी होती हैं
कि एक की बेटी में दिखती है दूसरे को अपनी बेटी की शक्ल

चौथे की बेटी जब बैठ कर चली गयी कार में
तो लगा जैसे ब्रह्माण्ड में कोई आवाज़ नहीं बची

एकाएक अपनी उम्र लगी हम सबको ,
अपनी उम्र से कुछ ज्यादा.
                                 

अप्रैल 11, 2010

हार-जीत

अशोक वाजपेयी की गद्य-कविता ' हार-जीत ' हिंसा की संस्कृति को बेहद शांत रूप में उघारती है. यह कविता  ताकत , वर्चश्व  और हिंसा के संस्थानों के सच को सामने लाती है. यह युद्ध मात्र का सच प्रकट करती है, स्वाभाविक रूप से  इससे उसके  सम्बद्ध पक्षों का सच भी प्रकट हो जाता है.

वे उत्सव मना रहे हैं. सारे शहर में रौशनी की जा रही है. उन्हें बताया गया है कि
उनकी सेना और रथ विजय प्राप्त कर लौट रहे हैं. नागरिकों में से ज्यादातर को पता
नहीं है कि किस युद्ध में उनकी सेना और शासक गए थे, युद्ध किस बात पर था.
यह भी नहीं कि शत्रु कौन था पर वे विजयपर्व मनाने की तैयारी में व्यस्त हैं. उन्हें सिर्फ
इतना पता है कि उनकी सेना विजय हुई. उनकी से आशय क्या है यह भी स्पष्ट नहीं है :
किसकी विजय हुई सेना की, कि शासक की, कि नागरिकों की ? किसी के पास पूछने
का अवकाश नहीं है. नागरिकों को नहीं पता कि कितने सैनिक गए थे  और कितने
विजयी वापस आ रहे हैं. खेत रहने वालों की सूची अप्रकाशित है. सिर्फ एक बूढ़ा
मशकवाला है जो सड़कों को सींचते हुए कह रहा है कि हम एक बार फिर हार गए हैं
और गाजे बाजे के साथ जीत नहीं हार लौट रही है. उस पर कोइ ध्यान नहीं देता है
और अच्छा यह है कि उस पर सड़कें सींचने भर की जिम्मेवारी है, सच को दर्ज करने
या बोलने की नहीं. जिन पर है वे सेना के साथ ही जीतकर लौट रहे हैं.

अप्रैल 07, 2010

हिंसा और प्रतिहिंसा

नक्सली हिंसा में ७४ से अधिक सिपाहियों के मरने की कीमत कौन चुका सकता है, इसके बदले में १७४ 'माओवादियों' को मार गिरा कर क्या बदला लिया जा सकता है ! कैसे संभव है यह ? जब इस तरह जवानों की लाश गिरती है तो वह  केवल मातम या उत्सव का दिवस नहीं होता. क्या-क्या टूटता है इसे न गोलियां जानती हैं और न वे जो गोलियां पैदा करते हैं.
मोहन राकेश की एकांकी 'सिपाही की माँ' ऐसे मौके पर बहुत विचलित करने वाली रचना है. युद्ध मात्र की वास्तविकता और क्रूरता को जितनी बेचैनी, ठोस और मानवीय सरोकारों के साथ यह रचना दिखाती है, वह बेहद मार्मिक है. इसमें एक ऐसी माँ-बेटी की कहानी है जिनके घर का इकलौता बेटा, जिस पर माँ की और विवाह के योग्य बहन की उम्मीदें टिकी हैं, फौज में भरती हो जाता है और मोर्चे पर चला जाता है. उसकी माँ यह भी नहीं जानती कि बर्मा जहाँ उसका बेटा लड़ रहा है, उसके गाँव से कितनी दूर है. माँ और बेटी का जागना भी मानक के लिए है और सोना भी. प्रतीक्षा के लम्बे उदास दिनों से जूझतीं माँ बेटी का अकेलापन अभावों और चिंताओं का ठिकाना हो गया है.एकांकी का अंत विषादपूर्ण  है, एक दूसरा सिपाही भी है, वह मानक को मरना चाहता है और मानक उसे.
मानक और सिपाही में हम उन्हें पहचान सकते हैं, जो यह नहीं जानते की युद्ध किस बात पर है, हिंसा किसलिए है.
एकांकी के अंत से यह अंश पढ़िये...........

          सिपाही- इसकी (मानक की) किसी के साथ दुश्मनी नहीं है ?....यह देख (बटन खोल कर अपना लहू से तरबतर सीना दिखता है) ये सब घाव इसी के किए हुए है. मैं इन घावों से कब का मर चुका होता. लेकिन सिर्फ इसे मारने के लिए जिन्दा हूँ. इसे मारे बिना मैं नहीं मरूँगा .
    बिशनी- तू बात क्यों नहीं समझता ? मैं इसकी माँ हूँ. यह किसी दुश्मनी से लड़ाई में नहीं गया . इसे मैंने लड़ाई में भेजा था.... इसकी बहन अब ब्याहने जोग हो गयी है. छह महीने-साल में हमें उसका ब्याह करना है. हमारे घर की हालत बहुत ख़राब है. अगर लड़की के ब्याह की चिंता न होती तो हम लोग आधा पेट खाकर रह लेते पर मैं कभी इसे लड़ाई पर न भेजती. इस लड़के के सिवा घर में कोई कमानेवाला नहीं है. मैंने सोचा था कि लड़की ब्याही जाएगी तो फिर मैं इसे लड़ाई पर नहीं जाने दूँगी. फिर मैं इसका भी ब्याह कर दूँगी और इसे अपने पास घर में रखूंगी. मुझे क्या पता था कि लड़ाई में जाकर इसकी यह हालत हो जाएगी ? आज यह इस हाल में घर आया है. मैं आज इसे अपने से कैसे अलग कर सकती हूँ ?  इसकी जगह तू होता तो तेरी माँ तुम्हें  अपने से अलग होने देती ?
    सिपाही -  मेरी माँ...? ( जरा सा हंस कर)  मेरी माँ अब पागल हो गयी है. वह रोज मेरी मौत का इंतज़ार करती है. वह हंसकर कर कहती है कि  थोड़े दिनों में मेरे बेटे की लाश घर जाएगी. मेरी बीबी ने अभी से बेवा का स्वांग बना लिया है. उसने मुझे लिखा है कि जिस दिन वह मेरे मरने की खबर सुनेगी उस दिन गले में फांसी लगाकर मर जाएगी. उसके पेट में छह महीने का बच्चा है. उसके साथ ही वह भी मर जाएगा. (फिर से सीना खोलकर दिखता है.) और तेरे लड़के ने देख मेरा क्या हाल किया.....यह अभी भी मेरे खून का प्यासा है. इसकी आँखों को देख. इसकी आँखों में तुझे वहशियाना चमक दिखाई नहीं देती ?
     बिशनी - नहीं नहीं, इसकी आँखें ऐसी नहीं हैं. इस समय इसकी आँखें ऐसी लगती हैं. पर इनका असली रंग ऐसा नहीं है...........
   सिपाही - तू इसकी आँखों का रंग नहीं पहचानती. तू इसकी माँ है, पर तू इस रंग का मतलब नहीं जानती. इसकी आँखों में दुश्मन है. जब तक मैं सामने हूँ इसकी आँखों का रंग नहीं बदलेगा. देख, यह कैसे आँखों में खून भरकर मुझे देख रहा है.
               मानक सहसा अपने को झटककर उठ खड़ा होता है. वह सिपाही का गला दबाने के लिए उस पर झपटना चाहता है पर सिपाही झट से बन्दूक का कुंदा फिर तान देता है. बिशनी जल्दी से बन्दूक के कुंदे  के आगे जाती है.
   बिशनी - नहीं, तू इसे नहीं मरेगा. तुझे तेरी माँ की सौगंध, तू इसे नहीं मारेगा.
   सिपाही - मैं इसे नहीं मारूँगा तो यह मुझे मार देगा. तो यही चाहती है ?
   बिशनी - नहीं यह तुझे नहीं मारेगा. मै इसकी माँ हूँ. मैं इसे जानती हूँ, यह तुझे कभी नहीं मारेगा.
   मानक - (वीभत्स स्वर में) मैं इसे नहीं मारूँगा ? (रौद्र भाव से आगे बढ़ता हुआ) नहीं ! मैं इसे जरूर मारूँगा, मैं अभी इसके टुकड़े-टुकड़े कर दूंगा.
             आगे बढ़कर सिपाही को धक्का देता है जिससे वह लड़खड़ाकर पीछे गिर जाता है और बन्दूक उठा लेता है और उसका कुंदा सिपाही के सीने की ओर तान देता है.
             - मैं वहशी हूँ ! मैं जानवर हूँ ! मैं वहशी और जानवर से भी बढ़ कर हूँ. इस तरह मेरी तरफ क्यों देख रहा है ? उठ, उठकर मुझे ठोकर लगा....
             उसी तरह हँसता है जैसे वह सिपाही हंस रहा था. बिशनी जल्दी से बन्दूक के कुंदे के सामने आ जाती है.
बिशनी - नहीं मानक, तू इसे नहीं मारेगा ! यह भी हमारी तरह गरीब आदमी है. इसकी माँ इसके पीछे रो-रोकर पागल हो गयी है. इसके घर में बच्चा होनेवाला है. यह मर गया तो इसकी बीवी फांसी लगाकर मर जाएगी....
                    मानक बिशनी को झटककर बीच में से हटा देता hai
 मानक -  मैं इसे नहीं छोडूंगा. यह दुश्मन है. मैं इसको अभी मार दूंगा, अभी. यहीं....
बिशनी - नहीं मानक, तू इसे नहीं मारेगा...
                  फिर बीच में आने का प्रयत्न करती है पर मानक उसे फिर झटककर हटा देता है. बिशनी चारपाई पर गिरकर हाथों में मुँह छिपा लेती है. सिपाही पार्श्व की ओर हटता है. मानक उसके साथ-साथ आगे बढ़ता है.
मानक - मैं इसे अभी मार दूंगा. अभी इसकी बोटी-बोटी अलग कर दूंगा.....
                  सिपाही और मानक की आकृतियाँ धीरे-धीरे पार्श्व में जाकर विलीन हो जाती हैं. बिशनी हाथों में मुँह छिपाए हुए चिल्ला उठती है.
बिशनी - मानक ! मानक !
                 एक साथ चार - छह गोलियां चलने और उसके साथ सिपाही के कराहने का शब्द सुनाए देता है. सहसा खामोशी छा जाती है. बिशनी उसी तरह चिल्लाती है : मानक ! मानक ! मुन्नी जल्दी से करवट बदलकर उठ बैठती है.
मुन्नी - (घबराए हुए स्वर में) माँ !
बिशनी - (उसी तरह) मानक !
               मुन्नी जल्दी से उठकर ढिबरी जला देती है. प्रकाश का रंग हलके नीले से फिर पीला हो जाता है. मुन्नी बिशनी की चारपाई  पर जा बैठती है.
मुन्नी - क्या बात है, माँ ?
               बिशनी आँखों से हाथ हटाकर, चुन्धिआई सी नज़रों से चारों ओर देखती है.
बिशनी - (कुछ खोजती सी) मानक !
मुन्नी - तुम रोज़ भैया के ही सपने देखती हो, माँ ? मैंने तुमसे कहा था, अगले मंगल को भैया की चिट्ठी जरूर आएगी.
बिशनी - (जैसे आत्मगत) चिट्ठी आएगी ?.....और वह आप...?
मुन्नी - थोड़े दिनों में भैया आप भी आएँगे. तुम आप ही कहती थीं  कि वे जल्दी आएँगे और मेरे लिए कड़े और चूड़ियां लायेंगे......
बिशनी - कड़े और चूड़ियां ?........ ओ मुन्नी !
             उसे अपने साथ सटा लेती है और आँखों से ताप-ताप पानी बरसने लगता है.
मुन्नी - भैया मेरे लिए जो कड़े लायेंगे, वे तारो और बंतो के कड़ों से भी अच्छे होंगे न, माँ ?
               बिशनी आँखें बंद करके नकारात्मक भाव से सिर हिलती है पर शीघ्र ही पाने को संभाल लेती है.
बिशनी - हाँ बेटी, तेरे कड़े सबके कड़ों से अच्छे होंगे.
मुन्नी - सुच्चे मोतियों के कड़े होंगे न, माँ ?
बिशनी - हाँ बेटी, सुच्चे मोतियों के कड़े.....
              उसका माथा चूमकर उसे अलग हटा देती है.
           - अब सो जा, अभी बहुत रात बाकी है.
                 मुन्नी अपनी चारपाई पर चली जाती है. बिशनी उठकर ढिबरी बुझा देती है. उसके ढिबरी बुझाते ही गहरा अँधेरा छा जाता है. अँधेरे में बिशनी के बुदबुदाने का स्वर सुनाई देता है.
           -            ताती वा ना लगाई, पार ब्रह्म सहाई.
                        राखनहारे रखिया, प्रभु व्याधि मिटाई.....

अप्रैल 01, 2010

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
शुक्लजी की आलोचना और इतिहास दृष्टि की कई विशेषताएँ गिनाई जा सकती हैं. इस पोस्ट में ऐसा कुछ नहीं किया जाएगा. हम ले चलेंगे आपको 'माधुरी' के पन्नों पर. माधुरी के वर्ष १३, खंड ६ संख्या १, में 'सम्पादकीय विचार' में शुक्लजी को  'हिंदी साहित्य सम्मलेन'  का सभापति बनाने के सम्बन्ध में चर्चा थी, इस चर्चा का महत्त्व अपनी जगह पर,  सबसे पहले जो चीज ध्यान खींचती है वह है शुक्लजी की तस्वीर. आप भी देखिए---


टिप्पणी यह थी....
"हमने गत संख्या में महात्माजी के हिंदी साहित्य सम्मलेन के इंदौर में होनेवाले अधिवेशन का सभापति चुने जाने का संवाद प्रकाशित कर इस उत्कृष्ट चुनाव के सम्बन्ध में हर्ष प्रकट किया था. पर हमें खेद है कि यह समाचार गलत निकला. हिंदी पत्रों में किसी ने यह गलत समाचार छपा दिया था. अब मालूम हुआ है कि इंदौर साहित्य सम्मलेन के कार्यकर्ताओं ने पूज्यपाद मदनमोहन जी मालवीय को सभापति चुना है और मालवीय जी ने इस शर्त पर उनकी प्रार्थना स्वीकार भी कर ली है कि अधिवेशन तक अगर उनका स्वास्थ्य ठीक रहा अथवा कुछ राजनीतिक कारणों से उन्हें विलायत न  जाना पड़ा तो वह अवश्य सभापति पद को अलंकृत करेंगे. इसमें संदेह नहीं कि मालवीयजी यदि सभापति हो सके तो सम्मलेन का सर्वोपरि सौभाग्य होगा. परन्तु हमारा ख्याल है कि मालवीयजी का स्वास्थ्य यदि ठीक रहा, ईश्वर करे, ऐसा ही हो- तो वह विलायत अवश्य जायेंगे. इसलिए उनके सभापति बन सकने की सम्भावना बहुत कम है. ऐसी परिस्थिति में सम्मलेन के लिए फिर सभापति का निर्वाचन अनिवार्य हो जाएगा. यदि ऐसा हो तो हम सम्मलेन के कर्णधारों के आगे पुनः काशी के पंडित रामचंद्र शुक्ल का नाम उपस्थित करना अपना कर्तव्य समझते हैं. शुक्लजी कितने बड़े अंग्रेजी और हिंदी साहित्य के विद्वान हैं, भाषा विज्ञान के कितने बड़े आचार्य हैं, समालोचना करने में कितने दक्ष हैं, उनका अध्ययन कितना गंभीर और विशाल है, यह अभी साधारण हिंदी पाठक शायद नहीं जानते. इसका कारण यही है कि आप आत्म-विज्ञापन से कोसों दूर रहकर साधना में लगे रहते हैं. आपने हिंदी साहित्य के उत्थान और अभ्युदय के लिए जो कुछ किया है, उसका मूल्य बहुत अधिक है. हमारी तो दृढ़ धारणा है कि अकेले शुक्लजी ने जितनी हिंदी सेवा की है उतनी हिंदी के दस-बीस धुरंधर सम्राटों ने भी मिलकर न की होगी. आपने जायसी, तुलसी और सूर की रचनाओं पर जो प्रकाश डाला है वह अद्भूत, अभूतपूर्व और अनवद्य है. आप अंग्रेजी और हिंदी के ही नहीं, संस्कृत, फारसी और बंग्ला के भी अच्छे ज्ञाता हैं. ऐसे विद्वान की अधिक समय तक उपेक्षा करना सम्मलेन और हिंदी-भाषी जनता, दोनों के लिए लज्जाजनक और मूर्खता का परिचायक होगा. हम जानते हैं कि शुक्लजी इस सम्मान के लिए लालायित नहीं हैं.पर हमारा भी तो कुछ कर्त्तव्य है. सम्मलेन के सभापति-पद से शुक्लजी का नहीं, बल्कि शुक्लजी के सभापतित्व से सम्मलेन का गौरव बढ़ेगा. हमें आशा है सम्मलेन के कर्णधार और हिन्दीप्रेमी जनता हमारी इन पंक्तियों पर अवश्य ध्यान देगी. हमारी उपेक्षा से ही सम्मलेन स्व. पंडित बालकृष्ण जी भट्ट पूज्यपाद आचार्य द्विवेदीजी - जैसे सुयोग्य विद्वानों का सम्मान करने के सौभाग्य से वंचित हो चुका है.सम्मलेन के कर्णधारों को पहले अधिकारियों की ओर दृष्टिपात करना चाहिए. इसी से सम्मलेन का गौरव बढ़ेगा और साहित्य की भी श्रीवृद्धि होगी. अधिक प्रसिद्धि की अपेक्षा ठोस काम और साहित्य-सेवा पर ही सभापति की चुनाव में ध्यान देना चाहिए.
शुक्लजी को नमन.