अप्रैल 07, 2010

हिंसा और प्रतिहिंसा

नक्सली हिंसा में ७४ से अधिक सिपाहियों के मरने की कीमत कौन चुका सकता है, इसके बदले में १७४ 'माओवादियों' को मार गिरा कर क्या बदला लिया जा सकता है ! कैसे संभव है यह ? जब इस तरह जवानों की लाश गिरती है तो वह  केवल मातम या उत्सव का दिवस नहीं होता. क्या-क्या टूटता है इसे न गोलियां जानती हैं और न वे जो गोलियां पैदा करते हैं.
मोहन राकेश की एकांकी 'सिपाही की माँ' ऐसे मौके पर बहुत विचलित करने वाली रचना है. युद्ध मात्र की वास्तविकता और क्रूरता को जितनी बेचैनी, ठोस और मानवीय सरोकारों के साथ यह रचना दिखाती है, वह बेहद मार्मिक है. इसमें एक ऐसी माँ-बेटी की कहानी है जिनके घर का इकलौता बेटा, जिस पर माँ की और विवाह के योग्य बहन की उम्मीदें टिकी हैं, फौज में भरती हो जाता है और मोर्चे पर चला जाता है. उसकी माँ यह भी नहीं जानती कि बर्मा जहाँ उसका बेटा लड़ रहा है, उसके गाँव से कितनी दूर है. माँ और बेटी का जागना भी मानक के लिए है और सोना भी. प्रतीक्षा के लम्बे उदास दिनों से जूझतीं माँ बेटी का अकेलापन अभावों और चिंताओं का ठिकाना हो गया है.एकांकी का अंत विषादपूर्ण  है, एक दूसरा सिपाही भी है, वह मानक को मरना चाहता है और मानक उसे.
मानक और सिपाही में हम उन्हें पहचान सकते हैं, जो यह नहीं जानते की युद्ध किस बात पर है, हिंसा किसलिए है.
एकांकी के अंत से यह अंश पढ़िये...........

          सिपाही- इसकी (मानक की) किसी के साथ दुश्मनी नहीं है ?....यह देख (बटन खोल कर अपना लहू से तरबतर सीना दिखता है) ये सब घाव इसी के किए हुए है. मैं इन घावों से कब का मर चुका होता. लेकिन सिर्फ इसे मारने के लिए जिन्दा हूँ. इसे मारे बिना मैं नहीं मरूँगा .
    बिशनी- तू बात क्यों नहीं समझता ? मैं इसकी माँ हूँ. यह किसी दुश्मनी से लड़ाई में नहीं गया . इसे मैंने लड़ाई में भेजा था.... इसकी बहन अब ब्याहने जोग हो गयी है. छह महीने-साल में हमें उसका ब्याह करना है. हमारे घर की हालत बहुत ख़राब है. अगर लड़की के ब्याह की चिंता न होती तो हम लोग आधा पेट खाकर रह लेते पर मैं कभी इसे लड़ाई पर न भेजती. इस लड़के के सिवा घर में कोई कमानेवाला नहीं है. मैंने सोचा था कि लड़की ब्याही जाएगी तो फिर मैं इसे लड़ाई पर नहीं जाने दूँगी. फिर मैं इसका भी ब्याह कर दूँगी और इसे अपने पास घर में रखूंगी. मुझे क्या पता था कि लड़ाई में जाकर इसकी यह हालत हो जाएगी ? आज यह इस हाल में घर आया है. मैं आज इसे अपने से कैसे अलग कर सकती हूँ ?  इसकी जगह तू होता तो तेरी माँ तुम्हें  अपने से अलग होने देती ?
    सिपाही -  मेरी माँ...? ( जरा सा हंस कर)  मेरी माँ अब पागल हो गयी है. वह रोज मेरी मौत का इंतज़ार करती है. वह हंसकर कर कहती है कि  थोड़े दिनों में मेरे बेटे की लाश घर जाएगी. मेरी बीबी ने अभी से बेवा का स्वांग बना लिया है. उसने मुझे लिखा है कि जिस दिन वह मेरे मरने की खबर सुनेगी उस दिन गले में फांसी लगाकर मर जाएगी. उसके पेट में छह महीने का बच्चा है. उसके साथ ही वह भी मर जाएगा. (फिर से सीना खोलकर दिखता है.) और तेरे लड़के ने देख मेरा क्या हाल किया.....यह अभी भी मेरे खून का प्यासा है. इसकी आँखों को देख. इसकी आँखों में तुझे वहशियाना चमक दिखाई नहीं देती ?
     बिशनी - नहीं नहीं, इसकी आँखें ऐसी नहीं हैं. इस समय इसकी आँखें ऐसी लगती हैं. पर इनका असली रंग ऐसा नहीं है...........
   सिपाही - तू इसकी आँखों का रंग नहीं पहचानती. तू इसकी माँ है, पर तू इस रंग का मतलब नहीं जानती. इसकी आँखों में दुश्मन है. जब तक मैं सामने हूँ इसकी आँखों का रंग नहीं बदलेगा. देख, यह कैसे आँखों में खून भरकर मुझे देख रहा है.
               मानक सहसा अपने को झटककर उठ खड़ा होता है. वह सिपाही का गला दबाने के लिए उस पर झपटना चाहता है पर सिपाही झट से बन्दूक का कुंदा फिर तान देता है. बिशनी जल्दी से बन्दूक के कुंदे  के आगे जाती है.
   बिशनी - नहीं, तू इसे नहीं मरेगा. तुझे तेरी माँ की सौगंध, तू इसे नहीं मारेगा.
   सिपाही - मैं इसे नहीं मारूँगा तो यह मुझे मार देगा. तो यही चाहती है ?
   बिशनी - नहीं यह तुझे नहीं मारेगा. मै इसकी माँ हूँ. मैं इसे जानती हूँ, यह तुझे कभी नहीं मारेगा.
   मानक - (वीभत्स स्वर में) मैं इसे नहीं मारूँगा ? (रौद्र भाव से आगे बढ़ता हुआ) नहीं ! मैं इसे जरूर मारूँगा, मैं अभी इसके टुकड़े-टुकड़े कर दूंगा.
             आगे बढ़कर सिपाही को धक्का देता है जिससे वह लड़खड़ाकर पीछे गिर जाता है और बन्दूक उठा लेता है और उसका कुंदा सिपाही के सीने की ओर तान देता है.
             - मैं वहशी हूँ ! मैं जानवर हूँ ! मैं वहशी और जानवर से भी बढ़ कर हूँ. इस तरह मेरी तरफ क्यों देख रहा है ? उठ, उठकर मुझे ठोकर लगा....
             उसी तरह हँसता है जैसे वह सिपाही हंस रहा था. बिशनी जल्दी से बन्दूक के कुंदे के सामने आ जाती है.
बिशनी - नहीं मानक, तू इसे नहीं मारेगा ! यह भी हमारी तरह गरीब आदमी है. इसकी माँ इसके पीछे रो-रोकर पागल हो गयी है. इसके घर में बच्चा होनेवाला है. यह मर गया तो इसकी बीवी फांसी लगाकर मर जाएगी....
                    मानक बिशनी को झटककर बीच में से हटा देता hai
 मानक -  मैं इसे नहीं छोडूंगा. यह दुश्मन है. मैं इसको अभी मार दूंगा, अभी. यहीं....
बिशनी - नहीं मानक, तू इसे नहीं मारेगा...
                  फिर बीच में आने का प्रयत्न करती है पर मानक उसे फिर झटककर हटा देता है. बिशनी चारपाई पर गिरकर हाथों में मुँह छिपा लेती है. सिपाही पार्श्व की ओर हटता है. मानक उसके साथ-साथ आगे बढ़ता है.
मानक - मैं इसे अभी मार दूंगा. अभी इसकी बोटी-बोटी अलग कर दूंगा.....
                  सिपाही और मानक की आकृतियाँ धीरे-धीरे पार्श्व में जाकर विलीन हो जाती हैं. बिशनी हाथों में मुँह छिपाए हुए चिल्ला उठती है.
बिशनी - मानक ! मानक !
                 एक साथ चार - छह गोलियां चलने और उसके साथ सिपाही के कराहने का शब्द सुनाए देता है. सहसा खामोशी छा जाती है. बिशनी उसी तरह चिल्लाती है : मानक ! मानक ! मुन्नी जल्दी से करवट बदलकर उठ बैठती है.
मुन्नी - (घबराए हुए स्वर में) माँ !
बिशनी - (उसी तरह) मानक !
               मुन्नी जल्दी से उठकर ढिबरी जला देती है. प्रकाश का रंग हलके नीले से फिर पीला हो जाता है. मुन्नी बिशनी की चारपाई  पर जा बैठती है.
मुन्नी - क्या बात है, माँ ?
               बिशनी आँखों से हाथ हटाकर, चुन्धिआई सी नज़रों से चारों ओर देखती है.
बिशनी - (कुछ खोजती सी) मानक !
मुन्नी - तुम रोज़ भैया के ही सपने देखती हो, माँ ? मैंने तुमसे कहा था, अगले मंगल को भैया की चिट्ठी जरूर आएगी.
बिशनी - (जैसे आत्मगत) चिट्ठी आएगी ?.....और वह आप...?
मुन्नी - थोड़े दिनों में भैया आप भी आएँगे. तुम आप ही कहती थीं  कि वे जल्दी आएँगे और मेरे लिए कड़े और चूड़ियां लायेंगे......
बिशनी - कड़े और चूड़ियां ?........ ओ मुन्नी !
             उसे अपने साथ सटा लेती है और आँखों से ताप-ताप पानी बरसने लगता है.
मुन्नी - भैया मेरे लिए जो कड़े लायेंगे, वे तारो और बंतो के कड़ों से भी अच्छे होंगे न, माँ ?
               बिशनी आँखें बंद करके नकारात्मक भाव से सिर हिलती है पर शीघ्र ही पाने को संभाल लेती है.
बिशनी - हाँ बेटी, तेरे कड़े सबके कड़ों से अच्छे होंगे.
मुन्नी - सुच्चे मोतियों के कड़े होंगे न, माँ ?
बिशनी - हाँ बेटी, सुच्चे मोतियों के कड़े.....
              उसका माथा चूमकर उसे अलग हटा देती है.
           - अब सो जा, अभी बहुत रात बाकी है.
                 मुन्नी अपनी चारपाई पर चली जाती है. बिशनी उठकर ढिबरी बुझा देती है. उसके ढिबरी बुझाते ही गहरा अँधेरा छा जाता है. अँधेरे में बिशनी के बुदबुदाने का स्वर सुनाई देता है.
           -            ताती वा ना लगाई, पार ब्रह्म सहाई.
                        राखनहारे रखिया, प्रभु व्याधि मिटाई.....

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