मई 11, 2010

राजेंद्रबाबू मेरे सर-माथे पर

राजेंद्र प्रसाद की ख्याति उनके छात्र जीवन में ही सार्वदेशिक हो गई थी, प्रसिद्ध है कि उनकी उत्तरपुस्तिका पर परीक्षार्थी के परीक्षक से श्रेष्ठ होने की टिप्पणी की गई थी । पटना में हाईकोर्ट खुलने से पहले वे कलकत्ता में वकालत करते थे, वकालत में भी उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया । वे गांधी के सच्चे अनुयायी थे, गांधी की पहली कर्मभूमि ‘चंपारण’ में वे उनके साथ-साथ थे । राजेंद्रबाबू सरलमना थे, एक उदार और करुण हृदय के स्वामी । तामझाम और आडंबर से दूर; गांधी की संगत ने उन्हें और भी तपा दिया था ।


वे बिहार प्रदेश काँग्रेस कमेटी के लंबे समय तक अध्यक्ष भी रहे । उन्हीं दिनों सुभाषचंद्र बोस एक बार पटना आए । राजेंद्रबाबू और सुभाषबाबू से जुड़ा एक संस्मरण रामबुझावनबाबू के खजाने से । (कोशिश की है कि उनके शब्दों में ही प्रस्तुत करूँ)

(प्रो. रामबुझावन सिंह; घर मसौढ़ी, सौ में दस कम यानी नब्बे; इतने ही वर्षों से वे इस दुनिया को देखते आ रहे हैं. और उनकी आँखों में जीवन इतना भरा है कि इतने और वर्षों की यात्रा अभी भी मजे से की जा सकती है, न जाने कितनी पीढ़ियों ने उन्हें देखा और उनसे पढ़ा है, आज के दिन देश के संभवतः सबसे बुजुर्ग शिक्षक. अभी बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् के निदेशक हैं. रामबुझावन बाबू स्मृतियों के कोष हैं, कोशिश करूंगा कि आगे भी उनसे कुछ पाकर आपसे साझा कर सकूं.


सुभाषबाबू पटना स्टेशन पर उतरे । वे स्वामी सहजानंद सरस्वती के निमंत्रण पर पटना आए थे और उन्हें बिहार में पटना समेत कई स्थानों पर सभाएँ करनी थीं । पटना में उनके स्वागत की कुछ अलग ही तैयारी थी । कदमकुआँ के कायस्थ समाज ने प्रण कर लिया था कि सुभाषचंद्र बोस को पटना प्रवेश करने नहीं देंगे । कारण क्या था – कलकत्ता में राजेंद्रबाबू के साथ बंगाली भद्रलोक ने अभद्रता की थी और इस घटना ने यहाँ के लोगों को उद्वेलित कर दिया था, उनका आरोप था कि यह सब सुभाषबाबू के इशारे पर हुआ । और इसी से पटना में उन्हें प्रवेश करने नहीं दिया जाएगा । सुभाषबाबू के इस विशेष स्वागत की तैयारी हो चुकी थी । कदमकुआँ का कायस्थ समाज स्टेशन पर जुट गया था, और इसे देखने के लिए हमारे जैसे छात्र भी जुटे थे, सुभाष बाबू गाड़ी से निकले नहीं कि इनसे घिर गए । कैसे कैसे कर के बाहर निकाले गए । उस दिन लॉन (आज के गांधी मैदान) में उनकी सभा होनी थी नहीं हो पाई । उपद्रवियों की ही चली, सुभाष बाबू उस दिन उत्तरबिहार चले आए और वहाँ सभा की । पटना का कार्यक्रम दूसरे दिन का बना । हम छात्रों में उन्हें सुनने की अलग ही ललक थी, पर सभा तो हो नहीं पाई । पटना मे सभा कैसे हो यह समस्या थी, तब जयप्रकाश नारायण को रांची से खबर दे कर बुलवाया गया । काट जेपी ही थे । जेपी आए और तब कार्यक्रम तय हुआ । सभा के दिन सुभाषबाबू के रास्ते में छात्रों और युवाओं का रेला था । सुभाषबाबू घोड़ागाड़ी पर थे और उनके साथ स्वामी सहजानंद सरस्वती थे, गाड़ी को घोड़ा क्या खींचता, हम छात्र ही खींचे चले आ रहे थे, सुभाषबाबू का जयघोष कर रहे थे, हमारी तनिक जिद्द थी कि उनके मुख से कुछ आशीर्वचन सुन लें, स्वामीजी अनमना रहे थे, वे इसके लिए तैयार नहीं थे ।

 पर सुभाषबाबू तैयार हो गए, कहा ये ही तो देश के भविष्य हैं । घोड़ागाड़ी पर ही खड़े होकर बोलना शुरू कर दिया, वह विराट व्यक्तित्व- क्या कहूँ । और पाँच मिनट तक कहते रहे- क्या समझ में आया, क्या नहीं, याद नहीं । बस सुभाषबाबू की जय करते हुए चले आए । शाम को सभा हुई, जेपी मंच पर बैठे थे और कदमकुआँ का कायस्थ समाज भी, जिन्होंने कोलाहल किया था आज शांत थे, दर्शक थे । जेपी ने अपने धीर-गंभीर स्वर में कहा-आप सब की सुनें, मानना या न मानना आपके ऊपर है । एक एक शब्द इस तरह से जैसे कोई शिक्षक अपने छात्रों को सीखा रहा हो । गहरी नदी की तरह । और जब सुभाषबाबू की बोलने की बारी आई मत पुछो, लगता था जैसे एक-एक शब्द बम हो । उनकी आवाज़ में बम फट रहा हो । शुरू ही किया उन्होंने कौन कहता है राजेंद्रबाबू के साथ अभद्रता में मेरी भूमिका है, अरे, राजेंद्रबाबू को तो मैं अपने माथे पर रखता हूँ । राजेंद्रबाबू को मैं अपने माथे पर रखता हूँ ।  फिर क्या था, कौन कोना था जिधर से तालियों की आवाज़ नहीं आ रही थी और सुभाषबाबू के जयकारे नहीं लग रहे थे ।

5 टिप्‍पणियां:

मनोज कुमार ने कहा…

उत्तम प्रस्तुति!
राजेंद्रबाबू को मैं अपने माथे पर रखता हूँ ।

आशुतोष पार्थेश्वर ने कहा…

मनोज जी,
आभार !

Rati ने कहा…

Me apake blog par pahali baar aayi hoon, udai prakash ke blog se apaka link mila
behad upyogi blog he apaka

www.kritya.in ke liye bhi to kuch bhejiye
Rati Saxena

शरद कोकास ने कहा…

इतिहास के यह नये नये पन्ने पढ़कर अच्च्छा लग रहा है ।

Bihari jee ने कहा…

एक बुजुर्ग शिक्षक की आन्खों में उतरकर अतीत को इतने निकट से दिखाने के लिये धन्यबाद !