जुलाई 16, 2010

यह घाव कितना गहरा है ?

      कश्मीर के बारे में खबरें आ रही हैं कि वहाँ हालात 1989 के जैसे हो गए हैं, जबकि आतंकियों की बंदूकें  वहाँ शांत हैं, आखिर यह स्थिति कैसे हो गई ? कश्मीर शांत दिखने लगा था फिर ये स्थिति कैसे हो गई, तो क्या वह खामोशी झूठी थी ? 27 जून 2010 को जनसत्ता में पंकज चतुर्वेदी की डल झील पर एक बेहद संवेदनशील रपट प्रकाशित हुई थी, डल झील के बहाने समूचे कश्मीर के दर्द को समझने का ईमानदार प्रयास वहाँ था । श्री भृगुनन्दन त्रिपाठी ने यह टिप्पणी उसी रपट के बाद लिखी, कश्मीर के यथार्थ को खंगालती यह टिप्पणी आपको उसकी परंपरा और यथार्थ से परिचित कराने की एक विनम्र कोशिश है । पंकज चतुर्वेदी की रपट के छपे और इस टिप्पणी के लिखे भी कुछ दिन गुजर गए हैं, और कश्मीर के हालात ऐसे हैं कि उसे रोज बिगड़ता हुआ घोषित किया जा रहा है । उम्मीदों का रास्ता सहल नहीं है, पर चलना तो है ही । कश्मीर को ऐसे में अकेला छोडना आत्मघाती होगा ।

 पिछले 27 जून रविवार को जनसत्ता में पंकज चतुर्वेदी का श्रीनगर की विश्वप्रसिद्ध डल झील पर प्रकाशित रपट आठ आठ आँसू रुलानेवाली है । उसे पढ़ते हुए मुझे कश्मीरी कवि अग्निशेखर की अनेक कविताएँ याद आती रहीं ।  उन्होंने वितस्ता पर, पान्द्रेठन के मंदिर, शंकराचार्य पर्वत और चिनार पर टीसती कविताएँ लिखी हैं । मुझे उन सबकी बेतरह याद आती रही ।  कश्मीर और भारत के अगणित लोगों की तरह कश्मीर मेरा भी घाव है जो रह रह कर हरा हो आता है । आज से 20 वर्ष पहले 1990 में कश्मीर के हिन्दी कवि अग्निशेखर ने एक कविता लिखी थी---भागे पंडित । शुरुआती पंक्तियाँ थीं :
            “ उनका क्या था इस भूमि पर, भागे पंडित
            कायर मुखबिर चुगलखोर थे, भागे पंडित
            उन्हें कहाँ था प्यार वतन से भागे पंडित
            पैदल भागे, दौड़ लगाते बिना वजह के, भागे पंडित”
कथन की युक्तियुक्तता का और खुद अपना ही माखौल उड़ाते व्यंग्य का यह स्वर उनका है जो भागने वालों  के पीछे रह गए हैं । यानी जो भागनेवाले हैं या उनमें शामिल हैं । और यह रहा पीछे छूट गया मंजर जो चीखते मौन में आत्मकथ्य बयान कर रहा है :
            “ मंदिर सुने, गलियां सुनी, सन्नाटा है, भागे पंडित
            त्योहारों की तिथियाँ सुनीं, जेबें सुनीं, भागे पंडित
            घर से भागे, डर से भागे, षड्यंत्रों से भागे पंडित
            किसको चिंता, नदियाँ सूखीं, लावारिस हैं, भागे पंडित”
कश्मीर क्रूर अनिश्चयों भरी दारुण नियति का लंबे समय से शिकार रहा है । निराला के शब्दों में वह क्रूर काल तांडव की स्मृति रेखा है । कश्मीरी कविता की माँ लल्द्यद एक वाख में कहती हैं : “ अभी जलता हुआ चुल्हा देखा और अभी उसमें न धुआं देखा न आग । अभी पांडवों की माता को देखा और अभी उसे एक कुम्हारिन के यहाँ शरणागता मौसी के रूप में देखा ।“ वे आगे कहती हैं :
            “ दमी डीठुम नद वहवुनी
             दमी ड्यूठुम सुम न तू तार
             दमी डीठुम ठार फोलुवनी
             दमी ड्यूठुम गुल न तु खार
(अभी मैंने बहती हुई नदी को देखा और अभी उस पर न कोई सेतु देखा और न पार उतरने के लिए पुलिया ही । अभी खिले हुई फूलों की एक डाली देखी और अभी उसपर न गुल देखे और न काँटे । )
पिछले 20 जून को खबर आई थी कि कश्मीर में श्रीनगर के खीर भवानी मंदिर के सालाना जलसे में  इस बार पचास हजार से अधिक लोग शामिल हुए । उल्लेखनीय तथ्य यह है कि इस साल इस त्योहार में इक्कीस वर्षों पूर्व विस्थापित हुए कश्मीरी पंडित भी काफी बड़ी संख्या में शामिल हुए और पूजा अर्चना की । इस राष्ट्रीय महत्त्व की उल्लेखनीय घटना का संपूर्ण श्रेय वहाँ के युवा मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को जाता है । उन्होंने यह महत्त्वपूर्ण शुरुआत की है जिसमें बीस से ज्यादा वर्षों की अपमानभरी जलावतनी में पड़े कश्मीरी पंडितों के घर वापस लौटाने की सम्मानपूर्ण पहल दिखाई पड़ती है और जिसमें न्यायसंगत पुनर्वास, सद्भाव, और शांति की आशा बंधती है । अपने ही देश में असह्य रूप से अपमान भरा कसैला निर्वासन भोगते हुए कश्मीरी पंडित दशकों से राहत शिविरों तथा बेगाने हो चुके देश समाज में आजीविका के लिए तिलमिलाते हुए भटकते रहे हैं । उनेक साथ इस बीच क्या कुछ हुआ इसकी कोई राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक लेखी नहीं है । कश्मीरी पंडितों का यह यंत्रणा और उत्पीड़न भरा दग्ध इतिहास बीसवीं और इक्कीसवीं सदियों के अंत और प्रारंभ का वह राष्ट्रीय कलंक है जिसे महज एक शर्मनाक हादसा कहकर छुट्टी नहीं पाई जा सकती ।  यह एक आईना है जिसमें राष्ट्रीय राजनीति को अपना चेहरा देखना चाहिए । क्या पक्ष, क्या विपक्ष क्या क्षेत्रीय, क्या राष्ट्रीय, क्या दक्षिण और क्या वाम – सभी इस आईने में अपना वह असली चेहरा देख सकते हैं जिसे देखने के बाद प्रदर्शित-विज्ञापित चेहरा अजनबी लगने लगे । अपने प्रश्नों- उत्तरों, अपनी चुप्पी और मुखरताओं की असलियत की पैमाइश और पहचान करते हुए । भारत की संसदीय राजनीति की प्रवंचनाओं में यह यह एक सबसे ज्वलंत और सबसे प्रासंगिक प्रवंचना है । उमर अब्दुल्ला जैसा एक गैरमौसमी, लंबी और स्थाई राजनीति का जज्बा और मंसूबा रखनेवाला जोशीला और होशियार राजनेता ही यह पहल कर सकता था । शायद इस पहल में एक अपेक्षित दुस्साहस है । पर कश्मीर और उसके मुतल्लिक भारतीय राजनीति में ऐसे ही रचनात्मक दुस्साहस की दरकार है ।
      निश्चय जी यह पहल काफी नहीं है । कसश्मीरी पंडितों और वहाँ की हिंदू जनता के स्थाई पुनर्वास; उनकी छिन चुकी जमीन, घर,बाग बगीचे आदि की अक्षुण्ण – अनाहत वापसी के लिए भी सरकारी और गैर सरकारी पहल होनी चाहिए । बिना ऐसा किए उनके विश्वासों की और उनकी अस्मिता एवं प्रतिष्ठा की बहाली संभव नहीं है । निश्चय ही इसमें कश्मीर के बुद्धिजीवियों लेखकों-पत्रकारों, कलाकारों और सबसे बढ़कर युवाओं का सहयोग अपरिहार्य है । अगर हो सके, तो कहना न होगा कि एक बड़ी मिसाल कायम होगी जिसका असर पूरे देश और दुनिया पर पड़ेगा । असली कश्मीरियत की जो धमक उमर अब्दुल्ला की इस पहल में देखी-सुनी गई उसका प्रीतिकर विस्फोट  हो सकता है । तब और केवल तभी धरती के स्वर्ग या जन्नत को फिर से पाया जा सकेगा । कश्मीर की बहुसंख्यक आबादी की गरीबी और फटेहाली को दूर करने की दिशा में; वहाँ की खेती, उद्योग-धंधे, दस्तकारी के संवार-निखार; खुशहाली और जिंदादिली की बहाली; कला-कौशल-संगीत और भाषा साहित्य-संस्कृति की ऊँचाइयों-गहराइयों को फिर से पाने के सपने तभी साकार हो सकेंगे । असली कश्मीरियत की बहाली कश्मीरी पंडितों की घर वापसी के साथ ही उस डल झील के पुनरुद्धार, वितस्ता आदि नदियों के निर्मलीकरण के संयुक्त और व्यापक अभियानों  के बिना संभव नहीं है । धरती का यह स्वर्ग कब तक धर्म और मजहब के दरिंदों का अखाड़ा बना रहेगा ? इसपर किन असुरों के आधिपत्य के लिए देवताओं को विस्थापित और निर्वासित किया जाता रहा है ? अपने गौरवशाली अतीत से काटकर कैसा हो गया कश्मीर ? आनंदवर्धन, मम्मट, अभिनवगुप्त, सोमदेव, क्षेमेन्द्र, कल्हण, लल्द्यद, हन्वा खातून आदि को विस्मृत कर तंत्र-योग-दर्शन-काव्य-कला-संगीत आदि की इस धरती की वह पहचान क्या फिर से पाई जा सकेगी ? आज यह जन्नत क्यों दोज़ख़ में बदलता जा रहा है ? निश्चय ही ये सवाल उमर अब्दुल्ला के जेहन में हैं और वे इसीलिए हैं की कश्मीरी जनता के हैं ये सवाल । उसे दशकों से मथ रहे हैं, बेचैन कर रहे हैं । लल्द्यद  कहती हैं: 
            “दोद क्या जानि यस न बने  
            गमुक्य जामु हा वलिथ तने ।
            गर गर फीरस फीरस प्ययम कने
            ड्यूठुम नु कह ति पननि कने ।।
(जिस पर दुख न पड़ा हो वह भला दर्द क्या जाने ? गम के वस्त्र पहनकर मैं घर-घर फिरी और मुझपर पत्थर बरसे तथा किसी को भी मेरा पक्ष लेते हुए न देखा ।)
      यह सच है । गमजदा कश्मीर का पक्ष लेता कोई दिखाई नहीं पड़ता । स्वयं कश्मीरी भाषा जहाँ भू-लुंठित और पद दलित है, जहाँ अपने अतीत, अपनी स्मृतियों और विरासत को लीपने-पोंछने की साजिशें चल रही हैं, अपनों से ज्यादा जहाँ जाती मामलों में गैर दिलचस्पी लेने लगे हैं और कुछ लोगों को जहाँ यह अच्छा लग रहा है, उसी कश्मीर और कश्मीरी कवयित्री का यह घाव सचमुच कितना हरा है ?
                                                भृगुनन्दन त्रिपाठी
                                                9631258579
                                       
                           
  

2 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

दिलचस्प लगा ...

sandeep ने कहा…

दिलचस्प लगा ...