सितंबर 28, 2010

दूसरा बनवास

कैफी साहब की यह नज़्म, आज इस उम्मीद के साथ पोस्ट कर रहा हूँ, कि आनेवाले किसी कल में राम को फिर से बनवास न मिले ।
2 अक्टूबर पास है और जिनके लिए यह दिन  उत्सव और घृणा के प्रदर्शन से परे, खुद की 'ईमानदारी' और 'देशभक्ति' को परखने का मौका होता है, उनसे यह विशेष आग्रह है कि दोनों हाथ उठाकर 'जागते रहें' और दूसरों की नींद तोड़ते रहें ।

राम बनवास से लौट कर जब घर में आए
याद जंगल बहुत आया जो नगर में आए
रक्से दीवानगी आँगन में जो देखा होगा
छह दिसंबर को सिरीराम ने सोचा होगा
इतने दीवाने कहाँ से मेरे घर में आए ।

जगमगाते के जहाँ राम के कदमों के निशां
प्यार की कहकशां लेती थी अंगड़ाई जहाँ
मोड़ नफरत के उसी राहगुजर में आए ।

धर्म क्या उनका है क्या जात है यह जानता कौन
घर  न जलता तो उन्हें रात में पहचानता कौन
घर जलाने को मेरा यार लोग जो घर में आए ।

शाकाहारी हैं मेरे दोस्त तुम्हारा खंजर
तुमने बाबर की तरफ फेंके थे सारे पत्थर
हैं मेरे सर की खता जख्म जो सर में आए ।

पाँव सरयू में अभी राम ने धोए भी न थे
कि नज़र आए वहाँ खून के गहरे धब्बे
पाँव धोए बिना सरयू के किनारे से उठे
राम ये कहते हुए अपने दुआरे से उठे
राजधानी की फिजाँ आई नहीं रास मुझे
छह दिसंबर को मिला दूसरा बनवास मुझे ।.....                कैफी आज़मी

3 टिप्‍पणियां:

शरद कोकास ने कहा…

कैफ़ी साहब की यह बेहतरीन नज़म है । पता नही कितनी बार बनवस होगा ...?

amar jeet ने कहा…

बदलते परिवेश मैं,
निरंतर ख़त्म होते नैतिक मूल्यों के बीच,
कोई तो है जो हमें जीवित रखे है ,
जूझने के लिए प्रेरित किये है,
उसी प्रकाश पुंज की जीवन ज्योति,
हमारे ह्रदय मे सदैव दैदीप्यमान होती रहे,
यही शुभकामना!!
दीप उत्सव की बधाई...........

केवल राम ने कहा…

बहुत खूब ...लाजबाब ..शुक्रिया
चलते -चलते पर आपका स्वागत है