कवितायेँ जीने के लिए जरूरी हैं, दूसरों की नहीं कहता; पर अपने लिए तो यह बहुत बड़ी जरूरत है. राजेश जोशी की पहले पढ़ी एक कविता आज फिर पढ़ी, नया कुछ लगा ऐसा नहीं कहूँगा. हाँ! पुराना जरूर सिहर गया.
राजेश जोशी की कविताओं में स्वाद होता है, कई किस्म के स्वाद. वह मिश्री की तरह घुलती है और नमक की तरह जीवन बनकर भी. यह मेरी प्रिय कविताओं में एक है, यह आपको भी ठहरा देगी, इतना विश्वास है.
बेटी की विदाई
वे तीनों अलग अलग शहरों से चौथे दोस्त की बेटी के ब्याह में आये थे
और कई दिनों बाद इस तरह इकट्ठे हुए थे
इस समय जब दोपहर लगभग ढल रही थी
तीनों घर के सामने के पेड़ की छाँव में
बैठे हुए थे
और चौथे की बेटी की बिदाई हो रही थी
अभी कुछ देर पहले तक वे हंस रहे थे और आपस में बतिया रहे थे
अब चौथे की बेटी लगभग घर के दरवाज़े पर आ पहुंची थी
और रस्म के अनुसार कोई मखाने और पैसे फेंक रहा था
बेटी कभी माँ के और कभी भाई के गले लग कर
रो रही थी
चौथा उसे अपनी एक बांह के घेरे में लिया था
वह अपने को संयत रखने की भरसक कोशिश कर रहा था
पर उसके आँख की कोरें बार बार भीग जाती थीं
वह रूमाल को चश्मे के कोनों के पास लाकर
चुपके से उन्हें पोंछ लेता था
वह घर के सामने बैठे तीनों दोस्तों की ओर
देखने से बच रहा था
तीनों दोस्त एकाएक चुप से हो गए थे
जैसे अचानक उनकी सारी बातें ख़त्म हो गयी हों
इनमे से एक की बेटी का ब्याह दस दिन बाद था
और दूसरे की बेटी का ग्यारह दिन बाद
थोड़ी देर पहले दोनों इसी बात पर अफ़सोस कर रहे थे
कि वे शामिल नहीं हो पाएंगे एक दूसरे की बेटी के ब्याह में
तीसरे की बेटी अभी कॉलेज में पढ़ रही थी
चौथे की बेटी लगभग घर की देहरी तक आ चुकी थी
तीनों दोस्त बीच बीच में चौथे की तरफ देखते थे
चौथा तीनों से अपनी आँख चुरा रहा था
तीनों में जो सबसे ज्यादा अनुभवी था कह रहा था
कि अभी तो चौथा अपने को बहुत संभाले हुए है
लेकिन विदा के बाद इसे संभालना होगा
तीनों दोस्त चुप थे
और एक दूसरे से पाना रोना छिपा रहे थे
तीनों एक दूसरे से नज़र चुराते हुए किसी न किसी बहाने
चुपचाप पोंछ लेते थे बार बार भीग जाती
आँखों की कोरों को
चौथे की बेटी की बिदाई में देख रहे तीनों
अपनी बेटी को बिदा होते
तुमने देखा है कभी
बेटी के जाने के बाद का कोई घर ?
जैसे बिना चिड़ियों की सुबह
जैसे बिना तारों का आकाश
बेटियाँ इतनी एक सी होती हैं
कि एक की बेटी में दिखती है दूसरे को अपनी बेटी की शक्ल
चौथे की बेटी जब बैठ कर चली गयी कार में
तो लगा जैसे ब्रह्माण्ड में कोई आवाज़ नहीं बची
एकाएक अपनी उम्र लगी हम सबको ,
अपनी उम्र से कुछ ज्यादा.
अप्रैल 20, 2010
अप्रैल 11, 2010
हार-जीत
अशोक वाजपेयी की गद्य-कविता ' हार-जीत ' हिंसा की संस्कृति को बेहद शांत रूप में उघारती है. यह कविता ताकत , वर्चश्व और हिंसा के संस्थानों के सच को सामने लाती है. यह युद्ध मात्र का सच प्रकट करती है, स्वाभाविक रूप से इससे उसके सम्बद्ध पक्षों का सच भी प्रकट हो जाता है.
वे उत्सव मना रहे हैं. सारे शहर में रौशनी की जा रही है. उन्हें बताया गया है कि
उनकी सेना और रथ विजय प्राप्त कर लौट रहे हैं. नागरिकों में से ज्यादातर को पता
नहीं है कि किस युद्ध में उनकी सेना और शासक गए थे, युद्ध किस बात पर था.
यह भी नहीं कि शत्रु कौन था पर वे विजयपर्व मनाने की तैयारी में व्यस्त हैं. उन्हें सिर्फ
इतना पता है कि उनकी सेना विजय हुई. उनकी से आशय क्या है यह भी स्पष्ट नहीं है :
किसकी विजय हुई सेना की, कि शासक की, कि नागरिकों की ? किसी के पास पूछने
का अवकाश नहीं है. नागरिकों को नहीं पता कि कितने सैनिक गए थे और कितने
विजयी वापस आ रहे हैं. खेत रहने वालों की सूची अप्रकाशित है. सिर्फ एक बूढ़ा
मशकवाला है जो सड़कों को सींचते हुए कह रहा है कि हम एक बार फिर हार गए हैं
और गाजे बाजे के साथ जीत नहीं हार लौट रही है. उस पर कोइ ध्यान नहीं देता है
और अच्छा यह है कि उस पर सड़कें सींचने भर की जिम्मेवारी है, सच को दर्ज करने
या बोलने की नहीं. जिन पर है वे सेना के साथ ही जीतकर लौट रहे हैं.
वे उत्सव मना रहे हैं. सारे शहर में रौशनी की जा रही है. उन्हें बताया गया है कि
उनकी सेना और रथ विजय प्राप्त कर लौट रहे हैं. नागरिकों में से ज्यादातर को पता
नहीं है कि किस युद्ध में उनकी सेना और शासक गए थे, युद्ध किस बात पर था.
यह भी नहीं कि शत्रु कौन था पर वे विजयपर्व मनाने की तैयारी में व्यस्त हैं. उन्हें सिर्फ
इतना पता है कि उनकी सेना विजय हुई. उनकी से आशय क्या है यह भी स्पष्ट नहीं है :
किसकी विजय हुई सेना की, कि शासक की, कि नागरिकों की ? किसी के पास पूछने
का अवकाश नहीं है. नागरिकों को नहीं पता कि कितने सैनिक गए थे और कितने
विजयी वापस आ रहे हैं. खेत रहने वालों की सूची अप्रकाशित है. सिर्फ एक बूढ़ा
मशकवाला है जो सड़कों को सींचते हुए कह रहा है कि हम एक बार फिर हार गए हैं
और गाजे बाजे के साथ जीत नहीं हार लौट रही है. उस पर कोइ ध्यान नहीं देता है
और अच्छा यह है कि उस पर सड़कें सींचने भर की जिम्मेवारी है, सच को दर्ज करने
या बोलने की नहीं. जिन पर है वे सेना के साथ ही जीतकर लौट रहे हैं.
अप्रैल 01, 2010
आचार्य रामचंद्र शुक्ल
आचार्य रामचंद्र शुक्ल
शुक्लजी की आलोचना और इतिहास दृष्टि की कई विशेषताएँ गिनाई जा सकती हैं. इस पोस्ट में ऐसा कुछ नहीं किया जाएगा. हम ले चलेंगे आपको 'माधुरी' के पन्नों पर. माधुरी के वर्ष १३, खंड ६ संख्या १, में 'सम्पादकीय विचार' में शुक्लजी को 'हिंदी साहित्य सम्मलेन' का सभापति बनाने के सम्बन्ध में चर्चा थी, इस चर्चा का महत्त्व अपनी जगह पर, सबसे पहले जो चीज ध्यान खींचती है वह है शुक्लजी की तस्वीर. आप भी देखिए---
टिप्पणी यह थी....
शुक्लजी की आलोचना और इतिहास दृष्टि की कई विशेषताएँ गिनाई जा सकती हैं. इस पोस्ट में ऐसा कुछ नहीं किया जाएगा. हम ले चलेंगे आपको 'माधुरी' के पन्नों पर. माधुरी के वर्ष १३, खंड ६ संख्या १, में 'सम्पादकीय विचार' में शुक्लजी को 'हिंदी साहित्य सम्मलेन' का सभापति बनाने के सम्बन्ध में चर्चा थी, इस चर्चा का महत्त्व अपनी जगह पर, सबसे पहले जो चीज ध्यान खींचती है वह है शुक्लजी की तस्वीर. आप भी देखिए---
"हमने गत संख्या में महात्माजी के हिंदी साहित्य सम्मलेन के इंदौर में होनेवाले अधिवेशन का सभापति चुने जाने का संवाद प्रकाशित कर इस उत्कृष्ट चुनाव के सम्बन्ध में हर्ष प्रकट किया था. पर हमें खेद है कि यह समाचार गलत निकला. हिंदी पत्रों में किसी ने यह गलत समाचार छपा दिया था. अब मालूम हुआ है कि इंदौर साहित्य सम्मलेन के कार्यकर्ताओं ने पूज्यपाद मदनमोहन जी मालवीय को सभापति चुना है और मालवीय जी ने इस शर्त पर उनकी प्रार्थना स्वीकार भी कर ली है कि अधिवेशन तक अगर उनका स्वास्थ्य ठीक रहा अथवा कुछ राजनीतिक कारणों से उन्हें विलायत न जाना पड़ा तो वह अवश्य सभापति पद को अलंकृत करेंगे. इसमें संदेह नहीं कि मालवीयजी यदि सभापति हो सके तो सम्मलेन का सर्वोपरि सौभाग्य होगा. परन्तु हमारा ख्याल है कि मालवीयजी का स्वास्थ्य यदि ठीक रहा, ईश्वर करे, ऐसा ही हो- तो वह विलायत अवश्य जायेंगे. इसलिए उनके सभापति बन सकने की सम्भावना बहुत कम है. ऐसी परिस्थिति में सम्मलेन के लिए फिर सभापति का निर्वाचन अनिवार्य हो जाएगा. यदि ऐसा हो तो हम सम्मलेन के कर्णधारों के आगे पुनः काशी के पंडित रामचंद्र शुक्ल का नाम उपस्थित करना अपना कर्तव्य समझते हैं. शुक्लजी कितने बड़े अंग्रेजी और हिंदी साहित्य के विद्वान हैं, भाषा विज्ञान के कितने बड़े आचार्य हैं, समालोचना करने में कितने दक्ष हैं, उनका अध्ययन कितना गंभीर और विशाल है, यह अभी साधारण हिंदी पाठक शायद नहीं जानते. इसका कारण यही है कि आप आत्म-विज्ञापन से कोसों दूर रहकर साधना में लगे रहते हैं. आपने हिंदी साहित्य के उत्थान और अभ्युदय के लिए जो कुछ किया है, उसका मूल्य बहुत अधिक है. हमारी तो दृढ़ धारणा है कि अकेले शुक्लजी ने जितनी हिंदी सेवा की है उतनी हिंदी के दस-बीस धुरंधर सम्राटों ने भी मिलकर न की होगी. आपने जायसी, तुलसी और सूर की रचनाओं पर जो प्रकाश डाला है वह अद्भूत, अभूतपूर्व और अनवद्य है. आप अंग्रेजी और हिंदी के ही नहीं, संस्कृत, फारसी और बंग्ला के भी अच्छे ज्ञाता हैं. ऐसे विद्वान की अधिक समय तक उपेक्षा करना सम्मलेन और हिंदी-भाषी जनता, दोनों के लिए लज्जाजनक और मूर्खता का परिचायक होगा. हम जानते हैं कि शुक्लजी इस सम्मान के लिए लालायित नहीं हैं.पर हमारा भी तो कुछ कर्त्तव्य है. सम्मलेन के सभापति-पद से शुक्लजी का नहीं, बल्कि शुक्लजी के सभापतित्व से सम्मलेन का गौरव बढ़ेगा. हमें आशा है सम्मलेन के कर्णधार और हिन्दीप्रेमी जनता हमारी इन पंक्तियों पर अवश्य ध्यान देगी. हमारी उपेक्षा से ही सम्मलेन स्व. पंडित बालकृष्ण जी भट्ट पूज्यपाद आचार्य द्विवेदीजी - जैसे सुयोग्य विद्वानों का सम्मान करने के सौभाग्य से वंचित हो चुका है.सम्मलेन के कर्णधारों को पहले अधिकारियों की ओर दृष्टिपात करना चाहिए. इसी से सम्मलेन का गौरव बढ़ेगा और साहित्य की भी श्रीवृद्धि होगी. अधिक प्रसिद्धि की अपेक्षा ठोस काम और साहित्य-सेवा पर ही सभापति की चुनाव में ध्यान देना चाहिए.शुक्लजी को नमन.
सदस्यता लें
संदेश (Atom)