शबीह की एक कविता पिछले पोस्ट में दी गई थी, यहाँ उनकी एक दूसरी कविता पढ़िए ।
गुलाब की सेज पर
लेटा, वो बच्चा !
रूई-से बिस्तर पर
सोया, वो बच्चा !
वो बच्चा,
जिसका भोलेपन भरा चेहरा,
प्यार भरी आँखें,
रस भरे होंठ,
किलकारियों भरी आवाज़,
लाल-लाल गाल,
छोटे-छोटे हाथ और पैर
जिसको छूने का मन चाहे,
थामने को दिल चाहे ।
'प्यार करने को कोई ऐसा होता
तो कल्पना सच हो जाती।'
जून 18, 2010
जून 10, 2010
हमारी नयी ज़िंदगी
शबीह ने अभी बारहवीं की परीक्षा पास की है, कविताओं से इन का नाता खून पानी का है, नौ दस साल की होंगी तब से ही शबीह ने कविता के साथ उठना बैठना शुरू कर दिया था, छोटी उम्र में ही उनकी कविताओं ने अनुभवों की निजता का परिचय दे दिया है, शबीह का पहला संकलन 'हमारी नयी ज़िंदगी ' 2006 में आ चुका है । शमीम हनफी और अरुण कमल ने इसकी भूमिका लिखी है। इस संकलन से इसी शीर्षक वाली कविता, यह नौ दस साल की उम्र में ही लिखी गई थी.................
चाँद की चाँदनी होती है
जो फूलों में जाकर सोती है
नन्हें बच्चों की आवाज़ कैसी होती है ?
चिड़ियों की चहचहाहट -सी होती है ।
फूल तो प्यारे होते हैं
उन्हें छूकर हवा बहती है
उनमें से कुछ पत्तियां बरसती हैं
उन्हीं कोमल फूल की पत्तियों से,
फूल जैसे बच्चों से
धरती की पवित्रता से,
बहते झरने से,
चाँद-सितारों से,
बरसते पानी की बूँदों से,
हमारे माँ - बाप से
शुरू होती है हमारी नयी ज़िंदगी !
-शबीह राहत
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