फूल लाया हूँ कमल के ।
क्या करूँ इनका ?
पसारें आप आँचल,
छोड़ दूँ,
हो जाए जी हल्का !
किन्तु क्या होगा कमल के फूल का ?
कुछ नहीं होता
किसी की भूल का-
मेरी कि तेरी हो-
ये कमल के फूल केवल भूल हैं ।
भूल से आँचल भरूँ ना
गोद में इनके सम्हाले
मैं वजन इनके मरूँ ना ।
ये कमल के फूल
लेकिन मानसर के हैं,
इन्हें हूँ बीच से लाया
ना समझो तरी पर के हैं ।
भूल भी यदि है
अछूती भूल है ?
मानसर वाले
कमल के फूल हैं । .........भवानीप्रसाद मिश्र
सितंबर 20, 2010
जुलाई 27, 2010
सावन घन प्राणों में बरसे
सावन आ गया, आया ही नहीं इसका आना दिख भी रहा है, पूरे आषाढ़ बादल रुठे रहे, आते थे पर बरसने को उनकी इच्छा ही नहीं होती थी । अब सावन में पहले ही दिन से घेरे हैं, धरती की प्यास देर से ही सही तृप्त कर रहे हैं ।
सावन पर निराला की दो रचनाएँ -
(1)
प्यासे तुमसे भरकर हरसे ।
सावन घन प्राणों में बरसे ।
उनयी आँखों में श्याम घटा,
विद्युत की नस-नस नई छटा,
फैली हरियाली अटा-अटा
अंगों के रंगों के परसे ।
अविरत रिमझिम वीणा द्रिमद्रिम;
प्रति छन रेलती पवन पश्चिम
मृदंग वादन, गति अविकृत्रिम
जी के भीतर से, बाहर से ।
(2)
धिक मद, गरजे बदरवा,
चमकि बिजुली डरपावे,
सुहावे सघन झर, नरवा
कगरवा कगरवा ।
सावन पर निराला की दो रचनाएँ -
(1)
प्यासे तुमसे भरकर हरसे ।
सावन घन प्राणों में बरसे ।
उनयी आँखों में श्याम घटा,
विद्युत की नस-नस नई छटा,
फैली हरियाली अटा-अटा
अंगों के रंगों के परसे ।
अविरत रिमझिम वीणा द्रिमद्रिम;
प्रति छन रेलती पवन पश्चिम
मृदंग वादन, गति अविकृत्रिम
जी के भीतर से, बाहर से ।
(2)
धिक मद, गरजे बदरवा,
चमकि बिजुली डरपावे,
सुहावे सघन झर, नरवा
कगरवा कगरवा ।
जून 18, 2010
कल्पना वाला बच्चा
शबीह की एक कविता पिछले पोस्ट में दी गई थी, यहाँ उनकी एक दूसरी कविता पढ़िए ।
गुलाब की सेज पर
लेटा, वो बच्चा !
रूई-से बिस्तर पर
सोया, वो बच्चा !
वो बच्चा,
जिसका भोलेपन भरा चेहरा,
प्यार भरी आँखें,
रस भरे होंठ,
किलकारियों भरी आवाज़,
लाल-लाल गाल,
छोटे-छोटे हाथ और पैर
जिसको छूने का मन चाहे,
थामने को दिल चाहे ।
'प्यार करने को कोई ऐसा होता
तो कल्पना सच हो जाती।'
गुलाब की सेज पर
लेटा, वो बच्चा !
रूई-से बिस्तर पर
सोया, वो बच्चा !
वो बच्चा,
जिसका भोलेपन भरा चेहरा,
प्यार भरी आँखें,
रस भरे होंठ,
किलकारियों भरी आवाज़,
लाल-लाल गाल,
छोटे-छोटे हाथ और पैर
जिसको छूने का मन चाहे,
थामने को दिल चाहे ।
'प्यार करने को कोई ऐसा होता
तो कल्पना सच हो जाती।'
जून 10, 2010
हमारी नयी ज़िंदगी
शबीह ने अभी बारहवीं की परीक्षा पास की है, कविताओं से इन का नाता खून पानी का है, नौ दस साल की होंगी तब से ही शबीह ने कविता के साथ उठना बैठना शुरू कर दिया था, छोटी उम्र में ही उनकी कविताओं ने अनुभवों की निजता का परिचय दे दिया है, शबीह का पहला संकलन 'हमारी नयी ज़िंदगी ' 2006 में आ चुका है । शमीम हनफी और अरुण कमल ने इसकी भूमिका लिखी है। इस संकलन से इसी शीर्षक वाली कविता, यह नौ दस साल की उम्र में ही लिखी गई थी.................
चाँद की चाँदनी होती है
जो फूलों में जाकर सोती है
नन्हें बच्चों की आवाज़ कैसी होती है ?
चिड़ियों की चहचहाहट -सी होती है ।
फूल तो प्यारे होते हैं
उन्हें छूकर हवा बहती है
उनमें से कुछ पत्तियां बरसती हैं
उन्हीं कोमल फूल की पत्तियों से,
फूल जैसे बच्चों से
धरती की पवित्रता से,
बहते झरने से,
चाँद-सितारों से,
बरसते पानी की बूँदों से,
हमारे माँ - बाप से
शुरू होती है हमारी नयी ज़िंदगी !
-शबीह राहत
मई 18, 2010
लोकमान्य की कुछ तस्वीरें
लोकमान्य बालगंगाधर तिलक और उनसे जुड़ी कुछ तस्वीरें ,,,,,,,,,
मई 11, 2010
राजेंद्रबाबू मेरे सर-माथे पर
राजेंद्र प्रसाद की ख्याति उनके छात्र जीवन में ही सार्वदेशिक हो गई थी, प्रसिद्ध है कि उनकी उत्तरपुस्तिका पर परीक्षार्थी के परीक्षक से श्रेष्ठ होने की टिप्पणी की गई थी । पटना में हाईकोर्ट खुलने से पहले वे कलकत्ता में वकालत करते थे, वकालत में भी उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया । वे गांधी के सच्चे अनुयायी थे, गांधी की पहली कर्मभूमि ‘चंपारण’ में वे उनके साथ-साथ थे । राजेंद्रबाबू सरलमना थे, एक उदार और करुण हृदय के स्वामी । तामझाम और आडंबर से दूर; गांधी की संगत ने उन्हें और भी तपा दिया था ।
वे बिहार प्रदेश काँग्रेस कमेटी के लंबे समय तक अध्यक्ष भी रहे । उन्हीं दिनों सुभाषचंद्र बोस एक बार पटना आए । राजेंद्रबाबू और सुभाषबाबू से जुड़ा एक संस्मरण रामबुझावनबाबू के खजाने से । (कोशिश की है कि उनके शब्दों में ही प्रस्तुत करूँ)
(प्रो. रामबुझावन सिंह; घर मसौढ़ी, सौ में दस कम यानी नब्बे; इतने ही वर्षों से वे इस दुनिया को देखते आ रहे हैं. और उनकी आँखों में जीवन इतना भरा है कि इतने और वर्षों की यात्रा अभी भी मजे से की जा सकती है, न जाने कितनी पीढ़ियों ने उन्हें देखा और उनसे पढ़ा है, आज के दिन देश के संभवतः सबसे बुजुर्ग शिक्षक. अभी बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् के निदेशक हैं. रामबुझावन बाबू स्मृतियों के कोष हैं, कोशिश करूंगा कि आगे भी उनसे कुछ पाकर आपसे साझा कर सकूं.
सुभाषबाबू पटना स्टेशन पर उतरे । वे स्वामी सहजानंद सरस्वती के निमंत्रण पर पटना आए थे और उन्हें बिहार में पटना समेत कई स्थानों पर सभाएँ करनी थीं । पटना में उनके स्वागत की कुछ अलग ही तैयारी थी । कदमकुआँ के कायस्थ समाज ने प्रण कर लिया था कि सुभाषचंद्र बोस को पटना प्रवेश करने नहीं देंगे । कारण क्या था – कलकत्ता में राजेंद्रबाबू के साथ बंगाली भद्रलोक ने अभद्रता की थी और इस घटना ने यहाँ के लोगों को उद्वेलित कर दिया था, उनका आरोप था कि यह सब सुभाषबाबू के इशारे पर हुआ । और इसी से पटना में उन्हें प्रवेश करने नहीं दिया जाएगा । सुभाषबाबू के इस विशेष स्वागत की तैयारी हो चुकी थी । कदमकुआँ का कायस्थ समाज स्टेशन पर जुट गया था, और इसे देखने के लिए हमारे जैसे छात्र भी जुटे थे, सुभाष बाबू गाड़ी से निकले नहीं कि इनसे घिर गए । कैसे कैसे कर के बाहर निकाले गए । उस दिन लॉन (आज के गांधी मैदान) में उनकी सभा होनी थी नहीं हो पाई । उपद्रवियों की ही चली, सुभाष बाबू उस दिन उत्तरबिहार चले आए और वहाँ सभा की । पटना का कार्यक्रम दूसरे दिन का बना । हम छात्रों में उन्हें सुनने की अलग ही ललक थी, पर सभा तो हो नहीं पाई । पटना मे सभा कैसे हो यह समस्या थी, तब जयप्रकाश नारायण को रांची से खबर दे कर बुलवाया गया । काट जेपी ही थे । जेपी आए और तब कार्यक्रम तय हुआ । सभा के दिन सुभाषबाबू के रास्ते में छात्रों और युवाओं का रेला था । सुभाषबाबू घोड़ागाड़ी पर थे और उनके साथ स्वामी सहजानंद सरस्वती थे, गाड़ी को घोड़ा क्या खींचता, हम छात्र ही खींचे चले आ रहे थे, सुभाषबाबू का जयघोष कर रहे थे, हमारी तनिक जिद्द थी कि उनके मुख से कुछ आशीर्वचन सुन लें, स्वामीजी अनमना रहे थे, वे इसके लिए तैयार नहीं थे ।
पर सुभाषबाबू तैयार हो गए, कहा ये ही तो देश के भविष्य हैं । घोड़ागाड़ी पर ही खड़े होकर बोलना शुरू कर दिया, वह विराट व्यक्तित्व- क्या कहूँ । और पाँच मिनट तक कहते रहे- क्या समझ में आया, क्या नहीं, याद नहीं । बस सुभाषबाबू की जय करते हुए चले आए । शाम को सभा हुई, जेपी मंच पर बैठे थे और कदमकुआँ का कायस्थ समाज भी, जिन्होंने कोलाहल किया था आज शांत थे, दर्शक थे । जेपी ने अपने धीर-गंभीर स्वर में कहा-आप सब की सुनें, मानना या न मानना आपके ऊपर है । एक एक शब्द इस तरह से जैसे कोई शिक्षक अपने छात्रों को सीखा रहा हो । गहरी नदी की तरह । और जब सुभाषबाबू की बोलने की बारी आई मत पुछो, लगता था जैसे एक-एक शब्द बम हो । उनकी आवाज़ में बम फट रहा हो । शुरू ही किया उन्होंने कौन कहता है राजेंद्रबाबू के साथ अभद्रता में मेरी भूमिका है, अरे, राजेंद्रबाबू को तो मैं अपने माथे पर रखता हूँ । राजेंद्रबाबू को मैं अपने माथे पर रखता हूँ । फिर क्या था, कौन कोना था जिधर से तालियों की आवाज़ नहीं आ रही थी और सुभाषबाबू के जयकारे नहीं लग रहे थे ।
वे बिहार प्रदेश काँग्रेस कमेटी के लंबे समय तक अध्यक्ष भी रहे । उन्हीं दिनों सुभाषचंद्र बोस एक बार पटना आए । राजेंद्रबाबू और सुभाषबाबू से जुड़ा एक संस्मरण रामबुझावनबाबू के खजाने से । (कोशिश की है कि उनके शब्दों में ही प्रस्तुत करूँ)
(प्रो. रामबुझावन सिंह; घर मसौढ़ी, सौ में दस कम यानी नब्बे; इतने ही वर्षों से वे इस दुनिया को देखते आ रहे हैं. और उनकी आँखों में जीवन इतना भरा है कि इतने और वर्षों की यात्रा अभी भी मजे से की जा सकती है, न जाने कितनी पीढ़ियों ने उन्हें देखा और उनसे पढ़ा है, आज के दिन देश के संभवतः सबसे बुजुर्ग शिक्षक. अभी बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् के निदेशक हैं. रामबुझावन बाबू स्मृतियों के कोष हैं, कोशिश करूंगा कि आगे भी उनसे कुछ पाकर आपसे साझा कर सकूं.
सुभाषबाबू पटना स्टेशन पर उतरे । वे स्वामी सहजानंद सरस्वती के निमंत्रण पर पटना आए थे और उन्हें बिहार में पटना समेत कई स्थानों पर सभाएँ करनी थीं । पटना में उनके स्वागत की कुछ अलग ही तैयारी थी । कदमकुआँ के कायस्थ समाज ने प्रण कर लिया था कि सुभाषचंद्र बोस को पटना प्रवेश करने नहीं देंगे । कारण क्या था – कलकत्ता में राजेंद्रबाबू के साथ बंगाली भद्रलोक ने अभद्रता की थी और इस घटना ने यहाँ के लोगों को उद्वेलित कर दिया था, उनका आरोप था कि यह सब सुभाषबाबू के इशारे पर हुआ । और इसी से पटना में उन्हें प्रवेश करने नहीं दिया जाएगा । सुभाषबाबू के इस विशेष स्वागत की तैयारी हो चुकी थी । कदमकुआँ का कायस्थ समाज स्टेशन पर जुट गया था, और इसे देखने के लिए हमारे जैसे छात्र भी जुटे थे, सुभाष बाबू गाड़ी से निकले नहीं कि इनसे घिर गए । कैसे कैसे कर के बाहर निकाले गए । उस दिन लॉन (आज के गांधी मैदान) में उनकी सभा होनी थी नहीं हो पाई । उपद्रवियों की ही चली, सुभाष बाबू उस दिन उत्तरबिहार चले आए और वहाँ सभा की । पटना का कार्यक्रम दूसरे दिन का बना । हम छात्रों में उन्हें सुनने की अलग ही ललक थी, पर सभा तो हो नहीं पाई । पटना मे सभा कैसे हो यह समस्या थी, तब जयप्रकाश नारायण को रांची से खबर दे कर बुलवाया गया । काट जेपी ही थे । जेपी आए और तब कार्यक्रम तय हुआ । सभा के दिन सुभाषबाबू के रास्ते में छात्रों और युवाओं का रेला था । सुभाषबाबू घोड़ागाड़ी पर थे और उनके साथ स्वामी सहजानंद सरस्वती थे, गाड़ी को घोड़ा क्या खींचता, हम छात्र ही खींचे चले आ रहे थे, सुभाषबाबू का जयघोष कर रहे थे, हमारी तनिक जिद्द थी कि उनके मुख से कुछ आशीर्वचन सुन लें, स्वामीजी अनमना रहे थे, वे इसके लिए तैयार नहीं थे ।
पर सुभाषबाबू तैयार हो गए, कहा ये ही तो देश के भविष्य हैं । घोड़ागाड़ी पर ही खड़े होकर बोलना शुरू कर दिया, वह विराट व्यक्तित्व- क्या कहूँ । और पाँच मिनट तक कहते रहे- क्या समझ में आया, क्या नहीं, याद नहीं । बस सुभाषबाबू की जय करते हुए चले आए । शाम को सभा हुई, जेपी मंच पर बैठे थे और कदमकुआँ का कायस्थ समाज भी, जिन्होंने कोलाहल किया था आज शांत थे, दर्शक थे । जेपी ने अपने धीर-गंभीर स्वर में कहा-आप सब की सुनें, मानना या न मानना आपके ऊपर है । एक एक शब्द इस तरह से जैसे कोई शिक्षक अपने छात्रों को सीखा रहा हो । गहरी नदी की तरह । और जब सुभाषबाबू की बोलने की बारी आई मत पुछो, लगता था जैसे एक-एक शब्द बम हो । उनकी आवाज़ में बम फट रहा हो । शुरू ही किया उन्होंने कौन कहता है राजेंद्रबाबू के साथ अभद्रता में मेरी भूमिका है, अरे, राजेंद्रबाबू को तो मैं अपने माथे पर रखता हूँ । राजेंद्रबाबू को मैं अपने माथे पर रखता हूँ । फिर क्या था, कौन कोना था जिधर से तालियों की आवाज़ नहीं आ रही थी और सुभाषबाबू के जयकारे नहीं लग रहे थे ।
मई 09, 2010
बेसन की सोंधी रोटी
बेसन की सोंधी रोटी पर
खट्टी चटनी-जैसी माँ
याद आती है चौका बासन
चिमटा, फुकनी जैसी माँ
बान की खुर्रि खाट के ऊपर
हर आहट पर कान धरे
आधी सोई आधी जागी
थकी दोपहरी जैसी माँ
चिड़ियों की चहकार में गूँजे
राधा-मोहन, अली-अली
मुर्गे की आवाज से खुलती
घर की कुंडी जैसी माँ
बीवी,बेटी,बहन,पड़ोसन
थोड़ी-थोड़ी-सी सब में
दिन भर एक रस्सी के ऊपर
चलती नटनी जैसी माँ
बाँट के अपना चेहरा, माथा
आँखें जाने कहाँ गई
फटे पुराने एक अलबम में
चंचल लड़की जैसी माँ
- निदा फ़ाज़ली
खट्टी चटनी-जैसी माँ
याद आती है चौका बासन
चिमटा, फुकनी जैसी माँ
बान की खुर्रि खाट के ऊपर
हर आहट पर कान धरे
आधी सोई आधी जागी
थकी दोपहरी जैसी माँ
चिड़ियों की चहकार में गूँजे
राधा-मोहन, अली-अली
मुर्गे की आवाज से खुलती
घर की कुंडी जैसी माँ
बीवी,बेटी,बहन,पड़ोसन
थोड़ी-थोड़ी-सी सब में
दिन भर एक रस्सी के ऊपर
चलती नटनी जैसी माँ
बाँट के अपना चेहरा, माथा
आँखें जाने कहाँ गई
फटे पुराने एक अलबम में
चंचल लड़की जैसी माँ
- निदा फ़ाज़ली
मई 06, 2010
जाना खुदा के पास है
के.के.दत्ता की एक किताब है, WRITINGS AND SPEECHES OF GANDHI JI RELATING TO BIHAR : FROM 1917-1947 . कुछ दूसरी चीजें तलाशते हुए यह किताब दिख गयी, उलट-पुलट कर देखा तो सबसे पहले इसमें जगह पाई तस्वीरों ने अपना ध्यान खिंचा. इस किताब में कई तस्वीरें डाली गयी हैं. पुस्तक के अंतिम पृष्ठों में गांधीजी की कई तस्वीरें हैं. १९४७ में पटना के मसौढ़ी थाने के दंगा प्रभावित क्षेत्रों में घूमते हुए, जनसमूह को संबोधित करते हुए. मसौढ़ी अब अनुमंडल है. सन ४७ में यह दंगों के कारण चर्चा में आया था. यों पिछले तीन दशकों से यह नक्सली गतिविधियों के लिए विशेष चर्चित रहा है. 'छह इंच छोटा कर देना' यहाँ का चलता हुआ और ख्यात मुहावरा है. कस्बाई रंगत वाला यह क्षेत्र तकनीक, मोबाइल और ऐसी तमाम चीजों से जुड़े होने पर भी शहरों की आबो-हवा से अधिक गंवई पहचान को बनाये रखने में अधिक यकीन रखता है. पटना और जहानाबाद के लगभग बीच में स्थित मसौढ़ी की यह पहचान कितने दिनों तक बची और बनी रहती है, यह देखना है .... ..
गाँधी के साथ तस्वीरों में 'सीमांत गाँधी' खान अब्दुल गफ्फार खाँ और प्रो.अब्दुल बारी प्रमुखता से दिखाई पड़ते हैं. बिहार में हो रहे दंगों की भयावहता सुन-जान गाँधी यहाँ आए थे,या कहें कि बुलाए गए थे. सुबह की प्रार्थना करते और फिर दिन भर वे पटना के आस-पास के इलाकों में घूमते रहते थे. यहाँ दंगों के नेपथ्य की चर्चा नहीं करूंगा, वह किसी और दिन. यहाँ तो गाँधी की बात होगी और उसी बहाने कुछ दूसरी चीजें. मसौढ़ी तो मसौढ़ी पटना का गाँधी मैदान इससे पहले 'गाँधी मैदान' नहीं कहलाता था. गाँधी की प्रार्थनाओं और सभाओं ने इसे 'गाँधी मैदान' बना दिया. पटना का 'गाँधी मैदान' इससे पहले 'लॉन' कहलाता था. जगह- जगह भटकते हुए, दंगों की आग और पीड़ा अपने कलेजे पर महसूस कर और अपने भर पीड़ितों के दुख को कम कर गाँधी शाम को फिर पटना आ जाते. इन दंगों की पहली जानकारी मुझे सफ़दर सर (प्रो. सफ़दर इमाम कादरी) से मिली थी, उन्हीं दिनों मैंने गाँधी को समझने की पहली कोशिश की थी, किताबों और उनमें दर्ज 'इतिहास' से अलग. (यह चर्चा फिर कभी, अभी मसौढ़ी की बात.) के.के. दत्ता की किताब ने इतिहास के इस अध्याय को तनिक निकट से देखने और जानने के लिए उकसाया.
गाँधी के साथ तस्वीरों में 'सीमांत गाँधी' खान अब्दुल गफ्फार खाँ और प्रो.अब्दुल बारी प्रमुखता से दिखाई पड़ते हैं. बिहार में हो रहे दंगों की भयावहता सुन-जान गाँधी यहाँ आए थे,या कहें कि बुलाए गए थे. सुबह की प्रार्थना करते और फिर दिन भर वे पटना के आस-पास के इलाकों में घूमते रहते थे. यहाँ दंगों के नेपथ्य की चर्चा नहीं करूंगा, वह किसी और दिन. यहाँ तो गाँधी की बात होगी और उसी बहाने कुछ दूसरी चीजें. मसौढ़ी तो मसौढ़ी पटना का गाँधी मैदान इससे पहले 'गाँधी मैदान' नहीं कहलाता था. गाँधी की प्रार्थनाओं और सभाओं ने इसे 'गाँधी मैदान' बना दिया. पटना का 'गाँधी मैदान' इससे पहले 'लॉन' कहलाता था. जगह- जगह भटकते हुए, दंगों की आग और पीड़ा अपने कलेजे पर महसूस कर और अपने भर पीड़ितों के दुख को कम कर गाँधी शाम को फिर पटना आ जाते. इन दंगों की पहली जानकारी मुझे सफ़दर सर (प्रो. सफ़दर इमाम कादरी) से मिली थी, उन्हीं दिनों मैंने गाँधी को समझने की पहली कोशिश की थी, किताबों और उनमें दर्ज 'इतिहास' से अलग. (यह चर्चा फिर कभी, अभी मसौढ़ी की बात.) के.के. दत्ता की किताब ने इतिहास के इस अध्याय को तनिक निकट से देखने और जानने के लिए उकसाया.
मसौढ़ी की बात किससे पूछता, किस किताब में ढूंढ़ता, वह किताब जो ४७ के पन्नों से मसौढ़ी के दुःख और पीड़ा और छटपटाहट और उजड़ने को सामने ले आये. धरती के इस कोने में खड़े गाँधी की बेचैनी को सामने ले आये ! 
रामबुझावन बाबू (प्रो. रामबुझावन सिंह) से जब यह प्रसंग छेड़ा तो जिसकी उम्मीद थी वही हुआ, पन्ने पलटे तो जो सुना वही सुनाने की कोशिश कर रहा हूँ.
(प्रो. रामबुझावन सिंह; घर मसौढ़ी, सौ में दस कम यानी नब्बे; इतने ही वर्षों से वे इस दुनिया को देखते आ रहे हैं. और उनकी आँखों में जीवन इतना भरा है कि इतने और वर्षों की यात्रा अभी भी मजे से की जा सकती है, न जाने कितनी पीढ़ियों ने उन्हें देखा और उनसे पढ़ा है, आज के दिन देश के संभवतः सबसे बुजुर्ग शिक्षक. अभी बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् के निदेशक हैं. रामबुझावन बाबू स्मृतियों के कोष हैं, कोशिश करूंगा कि आगे भी उनसे कुछ पाकर आपसे साझा कर सकूं.)मैं तब दरभंगा के सी. एम. कॉलेज में था. मसौढ़ी की खबर सुनकर चल पड़ा, सोनपुर के पहलेजा में जहाज पकड़ा. जहाज खुलने वाला था, छलांग लागाकर पकड़ा. पर यह क्या, जहाज पर कोई सवारी नहीं थी सिवाए मेरे. डर लगा. कब क्या हो जाए. कुछ अनहोनी न हो जाये यह सोचते हुए मन कांपता रहा. क्रूज के लोग कुछ कर न डालें यह सोच उन्हीं के पास हो लिया, उनसे पूछा कि और सवारी कहाँ हैं तो जवाब मिला- जानते नहीं है, कैसा माहौल है. जब जहाज उतरा तो पटने में रात के सन्नाटे के अलावे भी कुछ और था. उस अन्धकार में खौफ घुला था. रात अपने मौसेरे भाई के यहाँ टिककर सुबह मसौढ़ी पंहुचा. और मसौढ़ी का दृश्य मत पूछो. घृणा और हिंसा के खेल के बाद वहां गाँधी पहुँच चुके थे. सुबह में प्रार्थनाएं होती थीं, उनके सन्देश होते थे.
मसौढ़ी में जम कर दंगे हुए थे, बंगाल का बदला लिया गया था. हिंसा ऐसी कि उसकी याद भी रूह कँपा दे, लोग गांवों से भाग रहे थे. पर भाग कहाँ पाते थे उससे पहले ही अपनी जान गँवा देते थे. मसौढ़ी रेलवे का पश्चिमी प्लेटफ़ॉर्म लाशों से पट गया था. अपने घरों और गांवों को छोड़ने वाले मसौढ़ी को नहीं छोड़ पाए. जो लाशें बिछीं उनमें आधे को जला भी दिया गया ताकि मामला बराबरी का दिखे. कितनी लाशें मोरहन में बहा दी गईं, मोरहन का पानी लाल हो गया. कौए उसमें बहती लाशों पर बैठे रहते थे, ऐसी मार-काट मची थी.
जान लेने के लिए कई तरीके अपनाए गए, लोग भाग कर मसौढ़ी स्टेशन पहुँचते थे पर उन्हें यहाँ से जाने नहीं दिया जाता था. स्टेशन के पास ही एक जमींदार का चावल मिल था, उसमें एक भोंपू (सायरन) लगा था. जब लोग स्टेशन पर इकट्ठे हुए तो यह बज उठा, पर इसकी आवाज़ हमेशा से अलग थी. इसमें कुछ अलग सन्देश था. दंगाई जुट गए और लोग मारे गए. अपने घरों से उजड़ कर आए लोग जान बचाने के लिए एक कमरे में बंद हो गए और लोग इतने, कि कमरे में हवा भी नहीं अट सकती थी. कमरे को उन्होंने अन्दर से बंद कर लिया. अब लोग बाहर कैसे आएं, मारनेवालों के सामने यह समस्या थी, दरवाज़ा बंद था, उसे कैसे खुलवाया जाए. तब किरोसिन में कपड़े भिंगोकर जलाकर कमरे में ऊपर से डाले गए, और इस तरह दरवाज़ा खुल गया. और लोग....
गाँधी मसौढ़ी पहुँच गए थे. लोग अपने गाँव, कब्र में दफन पुरखों की हड्डियाँ छोड़ कर जा रहे थे. गाँधी किसे रोकते, जब कोई रुकनेवाला ही नहीं था. बस यही पूछते थे, कहाँ घर है. कहाँ जाओगे ? जवाब मिलता- पश्चिमी पाकिस्तान. वे सिर भी नहीं उठाते थे. झुके हुए माथे से, बस यही एक ठहरी हुई आवाज़ किसी तरह निकल पाती थी- कहाँ घर है. कहाँ जाओगे ? वे किसे रोकते और भला क्यों ? गांधीजी के सामने हजरत साईं गाँव के लोग खड़े थे. सवाल वही था- कहाँ जाओगे ? जो उत्तर मिलता उसे सरकारी अमला लिखता जाता. पर सिर्फ लिखता ही जाता था, गाँधी के भीतर तो कुछ टूटता,घटता जाता था. उन्होंने सवाल पुछा-कहाँ जाओगे ? जवाब मिला- खुदा मियां के घर ! गाँधी का झुका हुआ माथा उठा, सामने एक लम्बा, मजबूत कद काठी का, बड़ाहिल सा शख्स खड़ा था. मसौढ़ी की मिट्टी की तुर्शी उसके समूचे वजूद में घुली थी.यह अलग ही जवाब था जिसे गाँधी ने अब तक नहीं सुना था. वे देखते रहे. फिर पूछा- पर रहोगे कहाँ ? उसी अपने गाँव में, हजरत साईं में, जहाँ मेरे बाप-दादा की,सात पीढ़ियों की हड्डियाँ दफन हैं. जवाब मिला. गाँधी की आँखों में पहली बार चमक आई. पास खड़े खान अब्दुल गफ्फार खाँ की ओर ताका और इस जुबांदराज की पीठ ठोकते हुए कहा- शाबाश ! फिर क्या था, सिलसिला ही चल पडा, 'कहाँ जाओगे' के जवाब में अब शायद किसी ने ही कहा-पाकिस्तान. उस्मान मियाँ तो हीरो हो गए. गाँधी बुदबुदाते रहे, दुहराते रहे- रहना अपने गाँव में है, रहना अपने गाँव में है.
एस. डी. ओ. ने उस्मान मियाँ को अलग ला कर कहा, उस्मान साहब आप कहें तो बन्दूक का लाएसेंस आपको मिल जाए. उस्मान मियाँ ने टका सा जवाब दिया-जिन्हें दिया था उनकी जान बच गयी क्या ? अरे, जो गोतिए की तरह साथ में रहते आ रहे हैं उनसे जान न बची तो आपकी बन्दूक क्या जान बचाएगी ? रखिए अपना लाएसेंस और अपनी बन्दूक.
मई 04, 2010
'चाँद' से दो चिट्ठियाँ
'चाँद' हिंदी की एक चर्चित पत्रिका थी, साहित्यिक, सामाजिक और समकालीन राजनितिक विषय इसमें स्थान पाते थे, इसकी दृष्टि संकोचरहित थी. सुधारात्मक उत्साह के साथ यह देशोत्थान का लक्ष्य रखती थी. इसके 'मारवाड़ी' और 'फांसी' अंकों का ऐतिहासिक महत्त्व है. पत्रिका के तेवर तो ऐसे थे कि वह प्रेमचंद को टिप्पणियों को चुनौती देने में नहीं हिचकती थी. १९२३ से इस पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ हुआ था, इलाहबाद से; रामरख सिंह सहगल, महादेवी वर्मा आदि इसके सम्पादक रहे.
'चाँद' में सम्पादकीय टिप्पणियों और पाठकों के पत्रों के लिए भी स्थान था. सम्पादक पाठकों की समस्याओं पर सुझाव देते थे, समस्याएँ प्रायः पाठिकाओं की होती थीं. इसके साथ ही उसमें कुछ ऐसे पत्र भी प्रकाशित होते थे, जो समाज में स्त्रियों के हालात को बहुत तल्ख़ रूप में व्यक्त करते थे. यहाँ ऐसे दो पत्र प्रस्तुत हैं, पहला पत्र मई १९३० का है और दूसरा जून १९३० का.
'चाँद' में सम्पादकीय टिप्पणियों और पाठकों के पत्रों के लिए भी स्थान था. सम्पादक पाठकों की समस्याओं पर सुझाव देते थे, समस्याएँ प्रायः पाठिकाओं की होती थीं. इसके साथ ही उसमें कुछ ऐसे पत्र भी प्रकाशित होते थे, जो समाज में स्त्रियों के हालात को बहुत तल्ख़ रूप में व्यक्त करते थे. यहाँ ऐसे दो पत्र प्रस्तुत हैं, पहला पत्र मई १९३० का है और दूसरा जून १९३० का.
अप्रैल 20, 2010
बेटी की विदाई
कवितायेँ जीने के लिए जरूरी हैं, दूसरों की नहीं कहता; पर अपने लिए तो यह बहुत बड़ी जरूरत है. राजेश जोशी की पहले पढ़ी एक कविता आज फिर पढ़ी, नया कुछ लगा ऐसा नहीं कहूँगा. हाँ! पुराना जरूर सिहर गया.
राजेश जोशी की कविताओं में स्वाद होता है, कई किस्म के स्वाद. वह मिश्री की तरह घुलती है और नमक की तरह जीवन बनकर भी. यह मेरी प्रिय कविताओं में एक है, यह आपको भी ठहरा देगी, इतना विश्वास है.
बेटी की विदाई
वे तीनों अलग अलग शहरों से चौथे दोस्त की बेटी के ब्याह में आये थे
और कई दिनों बाद इस तरह इकट्ठे हुए थे
इस समय जब दोपहर लगभग ढल रही थी
तीनों घर के सामने के पेड़ की छाँव में
बैठे हुए थे
और चौथे की बेटी की बिदाई हो रही थी
अभी कुछ देर पहले तक वे हंस रहे थे और आपस में बतिया रहे थे
अब चौथे की बेटी लगभग घर के दरवाज़े पर आ पहुंची थी
और रस्म के अनुसार कोई मखाने और पैसे फेंक रहा था
बेटी कभी माँ के और कभी भाई के गले लग कर
रो रही थी
चौथा उसे अपनी एक बांह के घेरे में लिया था
वह अपने को संयत रखने की भरसक कोशिश कर रहा था
पर उसके आँख की कोरें बार बार भीग जाती थीं
वह रूमाल को चश्मे के कोनों के पास लाकर
चुपके से उन्हें पोंछ लेता था
वह घर के सामने बैठे तीनों दोस्तों की ओर
देखने से बच रहा था
तीनों दोस्त एकाएक चुप से हो गए थे
जैसे अचानक उनकी सारी बातें ख़त्म हो गयी हों
इनमे से एक की बेटी का ब्याह दस दिन बाद था
और दूसरे की बेटी का ग्यारह दिन बाद
थोड़ी देर पहले दोनों इसी बात पर अफ़सोस कर रहे थे
कि वे शामिल नहीं हो पाएंगे एक दूसरे की बेटी के ब्याह में
तीसरे की बेटी अभी कॉलेज में पढ़ रही थी
चौथे की बेटी लगभग घर की देहरी तक आ चुकी थी
तीनों दोस्त बीच बीच में चौथे की तरफ देखते थे
चौथा तीनों से अपनी आँख चुरा रहा था
तीनों में जो सबसे ज्यादा अनुभवी था कह रहा था
कि अभी तो चौथा अपने को बहुत संभाले हुए है
लेकिन विदा के बाद इसे संभालना होगा
तीनों दोस्त चुप थे
और एक दूसरे से पाना रोना छिपा रहे थे
तीनों एक दूसरे से नज़र चुराते हुए किसी न किसी बहाने
चुपचाप पोंछ लेते थे बार बार भीग जाती
आँखों की कोरों को
चौथे की बेटी की बिदाई में देख रहे तीनों
अपनी बेटी को बिदा होते
तुमने देखा है कभी
बेटी के जाने के बाद का कोई घर ?
जैसे बिना चिड़ियों की सुबह
जैसे बिना तारों का आकाश
बेटियाँ इतनी एक सी होती हैं
कि एक की बेटी में दिखती है दूसरे को अपनी बेटी की शक्ल
चौथे की बेटी जब बैठ कर चली गयी कार में
तो लगा जैसे ब्रह्माण्ड में कोई आवाज़ नहीं बची
एकाएक अपनी उम्र लगी हम सबको ,
अपनी उम्र से कुछ ज्यादा.
राजेश जोशी की कविताओं में स्वाद होता है, कई किस्म के स्वाद. वह मिश्री की तरह घुलती है और नमक की तरह जीवन बनकर भी. यह मेरी प्रिय कविताओं में एक है, यह आपको भी ठहरा देगी, इतना विश्वास है.
बेटी की विदाई
वे तीनों अलग अलग शहरों से चौथे दोस्त की बेटी के ब्याह में आये थे
और कई दिनों बाद इस तरह इकट्ठे हुए थे
इस समय जब दोपहर लगभग ढल रही थी
तीनों घर के सामने के पेड़ की छाँव में
बैठे हुए थे
और चौथे की बेटी की बिदाई हो रही थी
अभी कुछ देर पहले तक वे हंस रहे थे और आपस में बतिया रहे थे
अब चौथे की बेटी लगभग घर के दरवाज़े पर आ पहुंची थी
और रस्म के अनुसार कोई मखाने और पैसे फेंक रहा था
बेटी कभी माँ के और कभी भाई के गले लग कर
रो रही थी
चौथा उसे अपनी एक बांह के घेरे में लिया था
वह अपने को संयत रखने की भरसक कोशिश कर रहा था
पर उसके आँख की कोरें बार बार भीग जाती थीं
वह रूमाल को चश्मे के कोनों के पास लाकर
चुपके से उन्हें पोंछ लेता था
वह घर के सामने बैठे तीनों दोस्तों की ओर
देखने से बच रहा था
तीनों दोस्त एकाएक चुप से हो गए थे
जैसे अचानक उनकी सारी बातें ख़त्म हो गयी हों
इनमे से एक की बेटी का ब्याह दस दिन बाद था
और दूसरे की बेटी का ग्यारह दिन बाद
थोड़ी देर पहले दोनों इसी बात पर अफ़सोस कर रहे थे
कि वे शामिल नहीं हो पाएंगे एक दूसरे की बेटी के ब्याह में
तीसरे की बेटी अभी कॉलेज में पढ़ रही थी
चौथे की बेटी लगभग घर की देहरी तक आ चुकी थी
तीनों दोस्त बीच बीच में चौथे की तरफ देखते थे
चौथा तीनों से अपनी आँख चुरा रहा था
तीनों में जो सबसे ज्यादा अनुभवी था कह रहा था
कि अभी तो चौथा अपने को बहुत संभाले हुए है
लेकिन विदा के बाद इसे संभालना होगा
तीनों दोस्त चुप थे
और एक दूसरे से पाना रोना छिपा रहे थे
तीनों एक दूसरे से नज़र चुराते हुए किसी न किसी बहाने
चुपचाप पोंछ लेते थे बार बार भीग जाती
आँखों की कोरों को
चौथे की बेटी की बिदाई में देख रहे तीनों
अपनी बेटी को बिदा होते
तुमने देखा है कभी
बेटी के जाने के बाद का कोई घर ?
जैसे बिना चिड़ियों की सुबह
जैसे बिना तारों का आकाश
बेटियाँ इतनी एक सी होती हैं
कि एक की बेटी में दिखती है दूसरे को अपनी बेटी की शक्ल
चौथे की बेटी जब बैठ कर चली गयी कार में
तो लगा जैसे ब्रह्माण्ड में कोई आवाज़ नहीं बची
एकाएक अपनी उम्र लगी हम सबको ,
अपनी उम्र से कुछ ज्यादा.
अप्रैल 11, 2010
हार-जीत
अशोक वाजपेयी की गद्य-कविता ' हार-जीत ' हिंसा की संस्कृति को बेहद शांत रूप में उघारती है. यह कविता ताकत , वर्चश्व और हिंसा के संस्थानों के सच को सामने लाती है. यह युद्ध मात्र का सच प्रकट करती है, स्वाभाविक रूप से इससे उसके सम्बद्ध पक्षों का सच भी प्रकट हो जाता है.
वे उत्सव मना रहे हैं. सारे शहर में रौशनी की जा रही है. उन्हें बताया गया है कि
उनकी सेना और रथ विजय प्राप्त कर लौट रहे हैं. नागरिकों में से ज्यादातर को पता
नहीं है कि किस युद्ध में उनकी सेना और शासक गए थे, युद्ध किस बात पर था.
यह भी नहीं कि शत्रु कौन था पर वे विजयपर्व मनाने की तैयारी में व्यस्त हैं. उन्हें सिर्फ
इतना पता है कि उनकी सेना विजय हुई. उनकी से आशय क्या है यह भी स्पष्ट नहीं है :
किसकी विजय हुई सेना की, कि शासक की, कि नागरिकों की ? किसी के पास पूछने
का अवकाश नहीं है. नागरिकों को नहीं पता कि कितने सैनिक गए थे और कितने
विजयी वापस आ रहे हैं. खेत रहने वालों की सूची अप्रकाशित है. सिर्फ एक बूढ़ा
मशकवाला है जो सड़कों को सींचते हुए कह रहा है कि हम एक बार फिर हार गए हैं
और गाजे बाजे के साथ जीत नहीं हार लौट रही है. उस पर कोइ ध्यान नहीं देता है
और अच्छा यह है कि उस पर सड़कें सींचने भर की जिम्मेवारी है, सच को दर्ज करने
या बोलने की नहीं. जिन पर है वे सेना के साथ ही जीतकर लौट रहे हैं.
वे उत्सव मना रहे हैं. सारे शहर में रौशनी की जा रही है. उन्हें बताया गया है कि
उनकी सेना और रथ विजय प्राप्त कर लौट रहे हैं. नागरिकों में से ज्यादातर को पता
नहीं है कि किस युद्ध में उनकी सेना और शासक गए थे, युद्ध किस बात पर था.
यह भी नहीं कि शत्रु कौन था पर वे विजयपर्व मनाने की तैयारी में व्यस्त हैं. उन्हें सिर्फ
इतना पता है कि उनकी सेना विजय हुई. उनकी से आशय क्या है यह भी स्पष्ट नहीं है :
किसकी विजय हुई सेना की, कि शासक की, कि नागरिकों की ? किसी के पास पूछने
का अवकाश नहीं है. नागरिकों को नहीं पता कि कितने सैनिक गए थे और कितने
विजयी वापस आ रहे हैं. खेत रहने वालों की सूची अप्रकाशित है. सिर्फ एक बूढ़ा
मशकवाला है जो सड़कों को सींचते हुए कह रहा है कि हम एक बार फिर हार गए हैं
और गाजे बाजे के साथ जीत नहीं हार लौट रही है. उस पर कोइ ध्यान नहीं देता है
और अच्छा यह है कि उस पर सड़कें सींचने भर की जिम्मेवारी है, सच को दर्ज करने
या बोलने की नहीं. जिन पर है वे सेना के साथ ही जीतकर लौट रहे हैं.
अप्रैल 01, 2010
आचार्य रामचंद्र शुक्ल
आचार्य रामचंद्र शुक्ल
शुक्लजी की आलोचना और इतिहास दृष्टि की कई विशेषताएँ गिनाई जा सकती हैं. इस पोस्ट में ऐसा कुछ नहीं किया जाएगा. हम ले चलेंगे आपको 'माधुरी' के पन्नों पर. माधुरी के वर्ष १३, खंड ६ संख्या १, में 'सम्पादकीय विचार' में शुक्लजी को 'हिंदी साहित्य सम्मलेन' का सभापति बनाने के सम्बन्ध में चर्चा थी, इस चर्चा का महत्त्व अपनी जगह पर, सबसे पहले जो चीज ध्यान खींचती है वह है शुक्लजी की तस्वीर. आप भी देखिए---
टिप्पणी यह थी....
शुक्लजी की आलोचना और इतिहास दृष्टि की कई विशेषताएँ गिनाई जा सकती हैं. इस पोस्ट में ऐसा कुछ नहीं किया जाएगा. हम ले चलेंगे आपको 'माधुरी' के पन्नों पर. माधुरी के वर्ष १३, खंड ६ संख्या १, में 'सम्पादकीय विचार' में शुक्लजी को 'हिंदी साहित्य सम्मलेन' का सभापति बनाने के सम्बन्ध में चर्चा थी, इस चर्चा का महत्त्व अपनी जगह पर, सबसे पहले जो चीज ध्यान खींचती है वह है शुक्लजी की तस्वीर. आप भी देखिए---
"हमने गत संख्या में महात्माजी के हिंदी साहित्य सम्मलेन के इंदौर में होनेवाले अधिवेशन का सभापति चुने जाने का संवाद प्रकाशित कर इस उत्कृष्ट चुनाव के सम्बन्ध में हर्ष प्रकट किया था. पर हमें खेद है कि यह समाचार गलत निकला. हिंदी पत्रों में किसी ने यह गलत समाचार छपा दिया था. अब मालूम हुआ है कि इंदौर साहित्य सम्मलेन के कार्यकर्ताओं ने पूज्यपाद मदनमोहन जी मालवीय को सभापति चुना है और मालवीय जी ने इस शर्त पर उनकी प्रार्थना स्वीकार भी कर ली है कि अधिवेशन तक अगर उनका स्वास्थ्य ठीक रहा अथवा कुछ राजनीतिक कारणों से उन्हें विलायत न जाना पड़ा तो वह अवश्य सभापति पद को अलंकृत करेंगे. इसमें संदेह नहीं कि मालवीयजी यदि सभापति हो सके तो सम्मलेन का सर्वोपरि सौभाग्य होगा. परन्तु हमारा ख्याल है कि मालवीयजी का स्वास्थ्य यदि ठीक रहा, ईश्वर करे, ऐसा ही हो- तो वह विलायत अवश्य जायेंगे. इसलिए उनके सभापति बन सकने की सम्भावना बहुत कम है. ऐसी परिस्थिति में सम्मलेन के लिए फिर सभापति का निर्वाचन अनिवार्य हो जाएगा. यदि ऐसा हो तो हम सम्मलेन के कर्णधारों के आगे पुनः काशी के पंडित रामचंद्र शुक्ल का नाम उपस्थित करना अपना कर्तव्य समझते हैं. शुक्लजी कितने बड़े अंग्रेजी और हिंदी साहित्य के विद्वान हैं, भाषा विज्ञान के कितने बड़े आचार्य हैं, समालोचना करने में कितने दक्ष हैं, उनका अध्ययन कितना गंभीर और विशाल है, यह अभी साधारण हिंदी पाठक शायद नहीं जानते. इसका कारण यही है कि आप आत्म-विज्ञापन से कोसों दूर रहकर साधना में लगे रहते हैं. आपने हिंदी साहित्य के उत्थान और अभ्युदय के लिए जो कुछ किया है, उसका मूल्य बहुत अधिक है. हमारी तो दृढ़ धारणा है कि अकेले शुक्लजी ने जितनी हिंदी सेवा की है उतनी हिंदी के दस-बीस धुरंधर सम्राटों ने भी मिलकर न की होगी. आपने जायसी, तुलसी और सूर की रचनाओं पर जो प्रकाश डाला है वह अद्भूत, अभूतपूर्व और अनवद्य है. आप अंग्रेजी और हिंदी के ही नहीं, संस्कृत, फारसी और बंग्ला के भी अच्छे ज्ञाता हैं. ऐसे विद्वान की अधिक समय तक उपेक्षा करना सम्मलेन और हिंदी-भाषी जनता, दोनों के लिए लज्जाजनक और मूर्खता का परिचायक होगा. हम जानते हैं कि शुक्लजी इस सम्मान के लिए लालायित नहीं हैं.पर हमारा भी तो कुछ कर्त्तव्य है. सम्मलेन के सभापति-पद से शुक्लजी का नहीं, बल्कि शुक्लजी के सभापतित्व से सम्मलेन का गौरव बढ़ेगा. हमें आशा है सम्मलेन के कर्णधार और हिन्दीप्रेमी जनता हमारी इन पंक्तियों पर अवश्य ध्यान देगी. हमारी उपेक्षा से ही सम्मलेन स्व. पंडित बालकृष्ण जी भट्ट पूज्यपाद आचार्य द्विवेदीजी - जैसे सुयोग्य विद्वानों का सम्मान करने के सौभाग्य से वंचित हो चुका है.सम्मलेन के कर्णधारों को पहले अधिकारियों की ओर दृष्टिपात करना चाहिए. इसी से सम्मलेन का गौरव बढ़ेगा और साहित्य की भी श्रीवृद्धि होगी. अधिक प्रसिद्धि की अपेक्षा ठोस काम और साहित्य-सेवा पर ही सभापति की चुनाव में ध्यान देना चाहिए.शुक्लजी को नमन.
मार्च 27, 2010
नदियाँ रोती हैं
नदियाँ रोती हैं
अकबर ने बीरबल से पूछा कि बताओ किस दरिया का पानी सबसे अच्छा है,बीरबल ने जवाब दिया-यमुना का. अकबर को अचरज हुआ. पूछा तुमने गंगा का नाम क्यों नहीं लिया. बीरबल ने कहा-जहाँपनाह, पानी तो यमुना का ही अच्छा है. तो गंगा का क्या है- अकबर ने पूछा . बीरबल ने जवाब दिया-गंगा का पानी पानी थोड़े ही है, वह तो अमृत है.
केदारनाथ सिंह के संकलन 'उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ' में 'नदियाँ' शीर्षक से एक कविता संकलित है. मार्च महीने के इस तीसरे शनिवार को 'अर्थ आवर' मनाते हुए यह कविता कुछ बेहद ही मार्मिक, चिंतनीय और जरूरी सवाल खड़ा करती है.
धरती की तबियत ठीक नहीं है, और बिगडती ही जा रही है, कोई मानने वाला ही नहीं है कि यह दुनिया अब उतनी जिन्दा नहीं रह गयी है. केदारजी की यह कविता आसान नहीं है, पर; कविता से पहले नदियों से भेंट कर लें.
धरती की तबियत ठीक नहीं है, और बिगडती ही जा रही है, कोई मानने वाला ही नहीं है कि यह दुनिया अब उतनी जिन्दा नहीं रह गयी है. केदारजी की यह कविता आसान नहीं है, पर; कविता से पहले नदियों से भेंट कर लें.
पता नहीं कैसा पानी होगा वह, जिसके लिए अकबर और बीरबल के मन में इतना सम्मान था. वह कैसा पानी रहा होगा जिसके किनारे विद्यापति ने 'सुख सार' पाया था. पता नहीं.
हमने तो जो गंगा कानपुर,बनारस, पटना और भागलपुर में देखी है उसे देखकर तो यही सवाल उठा है कि 'क्या तुम ही गंगा हो'. माँ गंगा.
हाजीपुर, मेरा शहर. दो नदियों की गोद में बसा हुआ, दक्षिण में गंगा और पश्चिम में गंडक. दोनों का सम्बन्ध विष्णु से. दोनों के मिलन पर ही है 'हरिहरक्षेत्र'.
पर गंगा मर गयी है, मन को बहलाने के लिए भले कह लें कि अभी मरी नहीं है. पर सचाई येही है कि उसकी साँसे अब बाकि नहीं हैं .
गंडक का हाल भी इससे जुदा नहीं है, ये दोनों देव नदियाँ कहीं और नहीं इसी 'देवभूमि' में प्राण त्याग रही हैं.
ये बड़ी नदियाँ हैं, ऐसी छोटी नदियों की गिनती तो इस देश में हजारों में जाएगी.
नदियाँ मर रही हैं, कचड़ों से, नालों से, बांधों से, पुलों से और हम से. पटना और हाजीपुर के बीच गंगा पर महात्मा गाँधी सेतु है. लगभग ६ किलोमीटर लम्बा. विशाल, ज्यादा पुराना नहीं है, ३० साल भी नहीं हुए हैं इसके अभी. इस पर से कभी गुजरें तो यह पुल राजनेताओं और ठीकेदारों के भाईचारे और अपनी मजबूती की कहानियां सुनाता हुआ मिल जाएगा. अगर पहली बार जा रहे हों और फ़र्ज़ कीजिये कि जाम की वजह से पैदल चलना पर जाये, तो दिल दहल जाएगा आपका.
पर गंगा मर गयी है, मन को बहलाने के लिए भले कह लें कि अभी मरी नहीं है. पर सचाई येही है कि उसकी साँसे अब बाकि नहीं हैं .
गंडक का हाल भी इससे जुदा नहीं है, ये दोनों देव नदियाँ कहीं और नहीं इसी 'देवभूमि' में प्राण त्याग रही हैं.
ये बड़ी नदियाँ हैं, ऐसी छोटी नदियों की गिनती तो इस देश में हजारों में जाएगी.
पता नहीं गंगा पर क्या गुजरती होगी तब.
पुल से गंगा को देखिये वह निचुड़ी और थकी दिखेगी, बिखड़ी हुई, बँटी हुई, रेत ही रेत. बड़े ट्रक उसके सीने पर दौड़ते जाते हैं, खुली दौड़ है, बालू नहीं सोना है गंगा की पेट में.
गंडक गंगा से कुछ अलग मन मिजाज की नदी है,जगदीशचन्द्र माथुर का गंडक पर अद्भूत निबंध है 'ओ सदानीरा'.समूचे उत्तर बिहार की नदी-संस्कृति को समझने में अत्यंक ही सहायक. गंडक कभी वेगवती थी, उसे अब 'सदानीरा' कहना ठीक नहीं. वह सूख गयी है, कुछ मीटर का फासला छोड़ दें तो इसे पैदल पार किया जा सकता है.गंडक के एक किनारे पर हाजीपुर है और दूसरे किनारे पर सोनपुर. फासला लगभग १ किलोमीटर का. दोनों शहरो के बीच अभी तीन पुल खड़े हैं सबसे पुराना पुल अंग्रेजी राज का है, १०० साल से भी पुराना.यह पहले रेल पुल था.जो अब सड़क पुल के रूप में है.
दूसरा पुल रेल पुल है,लगभग आधी शताब्दी का,तीसरा पुल लगभग दो दशक पुराना, चौथा पुल अभी बन रहा है,तस्वीर में दिख जाएगा.
पुल नदियों पर खड़े हैं,केदारजी की ही एक चर्चित कविता है 'मांझी का पुल'.यह पुल बिहार और उत्तरप्रदेश को जोड़ता है. घाघरा नदी पर बने इस पुल को कभी केदार जी ने पंख फैलाये सारस के डैनों की तरह देखा था.यह १९८० की कविता है .समय वाकई बहुत-बहुत जल्द बदल गया...या बदल दिया गया ?
नदियाँ मर रही हैं, रोज, रोनेवाला कौन है ?
नदियाँ
वे हमें जानती हैं
जैसे जानती हैं वे अपनी मछलियों की बेचैनी
अपने तटों का तापमान
जो कि हमीं हैं
बस हमीं भूल गए हैं
हमारे घर कभी उनका भी
आना-जाना था
उनकी नसों में बहता है
पहाड़ों का खून
जिसमे थोड़ा सा खून
हमारा भी शामिल है
और गरम-गरम दूध
टपकता हुआ भूरे दरख्तों की छाल से
पता लगा लो
दरख्तों की छाल
और हमारी त्वचा का गोत्र
एक ही है
परछाइयां भी असल में
नदियाँ ही हैं
हमीं से फूटकर
हमारी बगल में चुपचाप बहती हुई नदियाँ
हर आदमी अपनी परछाईं में
नहाता है
और लगता है
नदी में नहा रहा है
जो लगता है वह भी
उतना ही सच है
जितना कोई भी नदी
पुल-
पृथ्वी के सारे के सारे पुल
एक गहरा षड्यंत्र हैं नदियों के खिलाफ
और नदियाँ उन्हें इस तरह बर्दाश्त करती हैं
जैसे कैदी जंजीरों को
हालांकि नदियाँ इसीलिए नदियाँ है
कि वे जब भी चाहती हैं
उलट-पुलट आर देती हैं सारा कैलेण्डर
और दिशाओं के नाम
हमारे देश में नदियाँ
जब कुछ नहीं करतीं
तब वे शवों का इंतजार करती हैं
अँधेरे को चीरते हुए
आते हैं शव
वे आते हैं अपनी चुप्पियों की चोट से
जीने की धार को तीव्रतर करते हुए
नदियाँ उन्हें देखती हैं
और जैसे चली जाती हैं कही अपने ही अन्दर
किन्हीं जलमग्न शहरों की
गंध की तलाश में
नदियाँ जोकि असल में
शहरों का आरम्भ हैं
और शहर जोकि असल में
नदियों का अंत
मुझे याद नहीं
मैंने भूगोल की किस किताब में पढ़ा था
अंत और आरम्भ
अपने विरोध की सारी ऊष्मा के साथ
जिस जगह मिलते हैं
कहीं वहीँ से निकलती हैं
सारी की सारी नदियाँ. ....
मार्च 23, 2010
भगत सिंह और प्रेमचंद
भगत सिंह और प्रेमचंद
भगत सिंह और गाँधी के सम्बन्ध कभी एक रैखिक रूप से व्याख्यायित नहीं किये जा सकते.गाँधी ने क्या कहा, यह महत्वपूर्ण तो हैं ही गाँधी के अनुयायिओं ने, जो देश के बौद्धिक प्रतिनिधि भी कहलाते थे, और हैं. भगत सिंह और देश के क्रन्तिकारी आन्दोलन के सम्बन्ध में क्या विचार रखते थे, यह गौरतलब है. प्रेमचंद एक ऐसे ही लेखक विचारक हैं. यहाँ उनके विचारों को देखना गैर मुनासिब नहीं होगा. प्रेमचंद ने एक तरह से भारतीय राजनीति की, कांग्रेस की राजनीति की, गाँधी की राजनीति की डेली रिपोर्टिंग की है. नेहरू,पटेल से लेकर कई राजनेताओं और महत्वपूर्ण राजनितिक गतिविधियों पर पर उनकी टिप्पणियां आती हैं, पर उनके समूचे साहित्य में कहीं भी भगत सिंह नहीं आते, सिवाए एक सन्दर्भ के. भगत सिंह की शहादत के एक ही दिन बाद २४ मार्च को वे पत्र में इस घटना का उल्लेख करते हैं. देखना जरूरी है की प्रेमचंद की भाषा क्या है, शब्द क्या हैं. संवेदना क्या है, ..
वे लिखते हैं-
"कराची का इरादा था मगर आज भगत सिंह की फांसी ने हिम्मत तोड़ दी. अब किस उम्मीद पर जाऊं. वहां गाँधी का मजाक उड़ेगा, कांग्रेस ग़ैर जिम्मेदार, शोरिसपसंद तबके के हाथ में जाएगी और हम लोगों के लिए उसमें जगह नहीं है. आइंदा क्या तर्ज़े अमल अख्तियार करना पड़े कह नहीं सकता मगर फिलहाल दिल बैठ गया है और मुस्तकबिल बिलकुल तारीक नज़र आता है. इधर बनारस, मिर्ज़ापुर, आगरे में जो हालात हुए उनसे गवर्नमेंट का हौसला बढ़ेगा यही मेरा कयास है. मगर इससे ज्यादा हिमाक़त कोई गवर्नमेंट नहीं कर सकती थी.तीन आदमियों की सज़ा में तबदीली करके गवर्नमेंट कितना अच्छा असर पैदा कर सकती थी. पर उसके तर्ज़े-अमल ने अब साबित कर दिया कि तालीफे कल्ब उसने अभी तक नहीं किया और अब भी वह अपनी उसी क़दीम ग़ैर जिम्मेदाराना रविश पर कायम है."
गाँधी के साथ कराची अधिवेशन में क्या हुआ, यह इतिहास की किताबों में दर्ज है. पर हम यह देखें कि प्रेमचंद सज़ा के होने पर सवाल न उठा कर उसके रूप-परिवर्तन और उस बहाने सरकार के उदार रूप प्रदर्शन की चर्चा पर ही टिके रहते हैं.यह प्रेमचंद की समझ थी, यह प्रेमचंद की वास्तविक समझ थी. जो किसी लेख, कहानी, अखबारी लेखन में नहीं पत्र में व्यक्त हुई थी. गाँधी का प्रभाव ऐसा था, प्रेमचंद के साहित्य से इस मौके पर एक और उदहारण पेश है. १९३१ का साल कई कारणों से महत्त्व पूर्ण है, इस वर्ष आजाद, भगत सिंह और उनके साथी, गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे कई सपूतों ने देश के लिए अपने प्राण त्यागे थे. इसी १९३१ के जून महीने में 'हंस' में प्रेमचंद ने 'देश की वर्तमान परिस्थिति' पर अपने विचार रखे. उसी टिप्पणी से ये अंश प्रस्तुत हैं.
महात्मा गाँधी क्रांति नहीं चाहते और न क्रांति से आज तक किसी जाति का उद्धार हुआ है. महात्मा जी ने हमें जो मार्ग बतलाया, उससे क्रांति की भीषणता के बिना ही क्रांति के लाभ प्राप्त हो सकते हैं, लेकिन एक ओर सरकार और उसके पिट्ठू जमींदार और दूसरी ओर हमारे कुछ तेजदम और जोशिले कार्यकर्ता नादिरशाह बने हुए क्रांति का सामान पैदा कर रहे हैं. सरकार से तो हमें कोई शिकायत नहीं. ............हमें तो शिकायत अपने उन जोशीले भाइयों से है जो महात्मा जी के किए धरे को मिट्टी में मिला रहे हैं. हमारी जीत पहले भी धर्म पर जमे रहने में थी,अब भी है और आगे भी रहेगी. हमने सरकार से जो समझौता किया है, उस पर हमें दृढ़ता के साथ डटे रहना चाहिए. हाथी के दांत दिखाने के और, और खाने के और वाली नीति पर चलने में हमारा कल्याण नहीं है, एक साथ युद्ध और शांति दोनों की दुहाई न देनी चाहिए,......... इन वीर पुरुषों में होड़ सी लगी हुई है कि कौन गर्म से गर्म बात कहकर जनता पर अपने नेतृत्व का सिक्का जमा दे. सच्चा लीडर हम उसे कहेंगे, जो देश को धर्म के रस्ते पर चलाये, जिसके कर्म और वचन में कोई अंतर न हो, जो भीतर से भी वैसा हो, जैसा बाहर से. बार-बार कहना कि हमें युद्ध के लिए तैयार रहना चाहिए, मानों समझौते की मुहलत केवल इसलिए मिली है कि युद्ध की तयारी की जाये, देश को धोखा देना है. देश को भारतीय चर्चिलों और राथरमियरों से बचाने की जरुरत है, वर्ना यह लोग स्वराज्य संग्राम को रक्तमय बनाकर इसे बदनाम कर देंगे और संसार की सहानुभूति खो बैठेंगे..........
प्रेमचंद के विचारों को तात्कालिक स्थितियों के सन्दर्भ में व्याख्यायित कर के पूरी तरह मुक्त नहीं किया जा सकता है. एक बार बस यही सोचें कि 'नादिरशाह' कौन थे.
रही बात स्वतंत्रता आन्दोलन का श्रेय लेने कि तो क्या कहा जाये, कांग्रेसियों से अधिक चतुर सुजान कौन हो सकता था, इतिहास की मनमानी व्याख्या का जहाँ तक प्रश्न है भगवाधारियों से अधिक इसमें और कौन माहिर हो सकता था.
भगत सिंह और गाँधी के सम्बन्ध कभी एक रैखिक रूप से व्याख्यायित नहीं किये जा सकते.गाँधी ने क्या कहा, यह महत्वपूर्ण तो हैं ही गाँधी के अनुयायिओं ने, जो देश के बौद्धिक प्रतिनिधि भी कहलाते थे, और हैं. भगत सिंह और देश के क्रन्तिकारी आन्दोलन के सम्बन्ध में क्या विचार रखते थे, यह गौरतलब है. प्रेमचंद एक ऐसे ही लेखक विचारक हैं. यहाँ उनके विचारों को देखना गैर मुनासिब नहीं होगा. प्रेमचंद ने एक तरह से भारतीय राजनीति की, कांग्रेस की राजनीति की, गाँधी की राजनीति की डेली रिपोर्टिंग की है. नेहरू,पटेल से लेकर कई राजनेताओं और महत्वपूर्ण राजनितिक गतिविधियों पर पर उनकी टिप्पणियां आती हैं, पर उनके समूचे साहित्य में कहीं भी भगत सिंह नहीं आते, सिवाए एक सन्दर्भ के. भगत सिंह की शहादत के एक ही दिन बाद २४ मार्च को वे पत्र में इस घटना का उल्लेख करते हैं. देखना जरूरी है की प्रेमचंद की भाषा क्या है, शब्द क्या हैं. संवेदना क्या है, ..
वे लिखते हैं-
"कराची का इरादा था मगर आज भगत सिंह की फांसी ने हिम्मत तोड़ दी. अब किस उम्मीद पर जाऊं. वहां गाँधी का मजाक उड़ेगा, कांग्रेस ग़ैर जिम्मेदार, शोरिसपसंद तबके के हाथ में जाएगी और हम लोगों के लिए उसमें जगह नहीं है. आइंदा क्या तर्ज़े अमल अख्तियार करना पड़े कह नहीं सकता मगर फिलहाल दिल बैठ गया है और मुस्तकबिल बिलकुल तारीक नज़र आता है. इधर बनारस, मिर्ज़ापुर, आगरे में जो हालात हुए उनसे गवर्नमेंट का हौसला बढ़ेगा यही मेरा कयास है. मगर इससे ज्यादा हिमाक़त कोई गवर्नमेंट नहीं कर सकती थी.तीन आदमियों की सज़ा में तबदीली करके गवर्नमेंट कितना अच्छा असर पैदा कर सकती थी. पर उसके तर्ज़े-अमल ने अब साबित कर दिया कि तालीफे कल्ब उसने अभी तक नहीं किया और अब भी वह अपनी उसी क़दीम ग़ैर जिम्मेदाराना रविश पर कायम है."
गाँधी के साथ कराची अधिवेशन में क्या हुआ, यह इतिहास की किताबों में दर्ज है. पर हम यह देखें कि प्रेमचंद सज़ा के होने पर सवाल न उठा कर उसके रूप-परिवर्तन और उस बहाने सरकार के उदार रूप प्रदर्शन की चर्चा पर ही टिके रहते हैं.यह प्रेमचंद की समझ थी, यह प्रेमचंद की वास्तविक समझ थी. जो किसी लेख, कहानी, अखबारी लेखन में नहीं पत्र में व्यक्त हुई थी. गाँधी का प्रभाव ऐसा था, प्रेमचंद के साहित्य से इस मौके पर एक और उदहारण पेश है. १९३१ का साल कई कारणों से महत्त्व पूर्ण है, इस वर्ष आजाद, भगत सिंह और उनके साथी, गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे कई सपूतों ने देश के लिए अपने प्राण त्यागे थे. इसी १९३१ के जून महीने में 'हंस' में प्रेमचंद ने 'देश की वर्तमान परिस्थिति' पर अपने विचार रखे. उसी टिप्पणी से ये अंश प्रस्तुत हैं.
महात्मा गाँधी क्रांति नहीं चाहते और न क्रांति से आज तक किसी जाति का उद्धार हुआ है. महात्मा जी ने हमें जो मार्ग बतलाया, उससे क्रांति की भीषणता के बिना ही क्रांति के लाभ प्राप्त हो सकते हैं, लेकिन एक ओर सरकार और उसके पिट्ठू जमींदार और दूसरी ओर हमारे कुछ तेजदम और जोशिले कार्यकर्ता नादिरशाह बने हुए क्रांति का सामान पैदा कर रहे हैं. सरकार से तो हमें कोई शिकायत नहीं. ............हमें तो शिकायत अपने उन जोशीले भाइयों से है जो महात्मा जी के किए धरे को मिट्टी में मिला रहे हैं. हमारी जीत पहले भी धर्म पर जमे रहने में थी,अब भी है और आगे भी रहेगी. हमने सरकार से जो समझौता किया है, उस पर हमें दृढ़ता के साथ डटे रहना चाहिए. हाथी के दांत दिखाने के और, और खाने के और वाली नीति पर चलने में हमारा कल्याण नहीं है, एक साथ युद्ध और शांति दोनों की दुहाई न देनी चाहिए,......... इन वीर पुरुषों में होड़ सी लगी हुई है कि कौन गर्म से गर्म बात कहकर जनता पर अपने नेतृत्व का सिक्का जमा दे. सच्चा लीडर हम उसे कहेंगे, जो देश को धर्म के रस्ते पर चलाये, जिसके कर्म और वचन में कोई अंतर न हो, जो भीतर से भी वैसा हो, जैसा बाहर से. बार-बार कहना कि हमें युद्ध के लिए तैयार रहना चाहिए, मानों समझौते की मुहलत केवल इसलिए मिली है कि युद्ध की तयारी की जाये, देश को धोखा देना है. देश को भारतीय चर्चिलों और राथरमियरों से बचाने की जरुरत है, वर्ना यह लोग स्वराज्य संग्राम को रक्तमय बनाकर इसे बदनाम कर देंगे और संसार की सहानुभूति खो बैठेंगे..........
प्रेमचंद के विचारों को तात्कालिक स्थितियों के सन्दर्भ में व्याख्यायित कर के पूरी तरह मुक्त नहीं किया जा सकता है. एक बार बस यही सोचें कि 'नादिरशाह' कौन थे.
रही बात स्वतंत्रता आन्दोलन का श्रेय लेने कि तो क्या कहा जाये, कांग्रेसियों से अधिक चतुर सुजान कौन हो सकता था, इतिहास की मनमानी व्याख्या का जहाँ तक प्रश्न है भगवाधारियों से अधिक इसमें और कौन माहिर हो सकता था.
भगत सिंह
भगत सिंह भारतीय ह्रदय की सबसे जीवंत स्मृतियों में से हैं. आज उनका बलिदान दिवस है. उनकी शहादत के बाद भारत की लगभग सभी भाषाओँ में उन पर लिखा गया, वह जन-ज्वार का प्रकटीकरण था. यहाँ 'माधुरी' के पन्नों से भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की तस्वीर दी जा रही है. ये तस्वीरें माधुरी के अप्रैल अंक में प्रकाशित हुई थीं. २५ मार्च को गणेश शंकर विद्यार्थी ने भी अपने प्राणों की आहुति दे दी थी, उस पृष्ठ पर उनकी भी तस्वीर थी. विद्यार्थी जी की तस्वीर के साथ यह शीर्षक था 'भारत के एक अमूल्य रत्न'. भगत सिंह और उनके साथियों के साथ शीर्षक था 'स्वतंत्रता के तीन दीवाने'. तस्वीरों के नीचे यह नोट भी जुड़ा था " यदि ये तीनों त्यागी वीर अहिंसा के पुजारी होते तो भारत को बहुत लाभ पहुंचा सकते. क्योंकि अहिंसा और शांति ही हमारा उद्धार कर सकती है. " पत्रिका के संपादक रामसेवक त्रिपाठी थे. पवित्र जन रुचि उनके शब्दों से पूरी तरह शायद ही सहमत थी.
भगत सिंह के पत्रों में गहरी, कोमल और हरी संवेदना मिलती है. यहाँ उनके दो पत्र प्रस्तुत हैं, पढ़िए और उस चिर युवा की संजीदगी से जुड़िये.
कुलतार सिंह के नाम अंतिम पत्र.
सेंट्रल जेल, लाहौर.
३ मार्च १९३१
अजीज कुलतार,
आज तुम्हारी आँखों में आंसू देखकर बहुत दुःख हुआ. आह तुम्हारी बातों में बहुत दर्द था, तुम्हारे आंसू मुझसे सहन नहीं होते.
बरखुरदार, हिम्मत से शिक्षा प्राप्त करना और सेहत का ख्याल रखना. हौसला रखना और क्या कहूँ !
उसे यह फिक्र है हरदम नया तर्ज़े-ज़फा क्या है,
हमें यह शौक़ है देखें सितम की इन्तहा क्या है.
दहर से क्यों खफा रहें, चर्ख का क्यों गिला करें,
सारा जहाँ अदू सही, आओ मुकाबला करें.
कोई दम का मेहमान हूँ ऐ अहले-महफ़िल
चरागे-सहर हूँ बुझा चाहता हूँ.
हवा में रहेगी मेरे ख्याल की बिजली,
ये मुश्ते-खाक है फानी, रहे रहे न रहे.
अच्छा रुखसत. खुश रहो अहले-वतन, हम तो सफ़र करते हैं. हिम्मत से रहना.
नमस्ते.
तुम्हारा भाई भगत सिंह
कुलबीर के नाम पत्र.
लाहौर सेंट्रल जेल,
३ मार्च १९३१
प्रिय कुलबीर सिंह,
तुमने मेरे लिए बहुत कुछ किया. मुलाक़ात के वक़्त ख़त के जवाब में कुछ लिख देने के लिए कहा.कुछ अल्फाज़ लिख दूँ, बस-देखो, मैंने किसी के लिए कुछ न किया, तुम्हारे लिए भी कुछ नहीं. आजकल बिलकुल मुसीबत में छोड़कर जा रहा हूँ. तुम्हारी जिन्दगी का क्या होगा ? गुज़ारा कैसे करोगे ? यही सब सोचकर कांप जाता हूँ, मगर भाई हौसला रखना, मुसीबत में भी कभी मत घबराना. इसके सिवा और क्या कह सकता हूँ. अमेरिका जा सकते तो बहुत अच्छा होता, मगर अब तो यह भी नामुमकिन मालूम होता है. आहिस्ता-आहिस्ता मेहनत से पढ़ते जाना. अगर कोई सिख सको तो बेहतर होगा, मगर सब कुछ पिताजी की सलाह से करना. जहाँ तक हो सके, मुहब्बत से सब लोग गुज़ारा करना. इसके सिवाए क्या कहूँ ?
जानता हूँ कि आज तुम्हारे दिल के अन्दर गम का सुमद्र ठाठें मार रहा है. भाई तुम्हारी बात सोचकर मेरी आँखों में आंसू आ रहे हैं, मगर क्या किया जाये, हौसला करना, मेरे अजीज, मेरे बहुत-बहुत प्यारे भाई, जिन्दगी बड़ी सख्त है और दुनिया बड़ी बे-मुरव्वत. सब लोग बड़े बेरहम हैं. सिर्फ मुहब्बत और हौसले से ही गुज़ारा हो सकेगा. कुलतार की तालीम की फिक्र भी तुम ही करना. बड़ी शर्म आती है और अफ़सोस के सिवाए मैं कर ही क्या सकता हूँ. साथ वाला ख़त हिंदी में लिखा हुआ है. ख़त 'के' की बहन को दे देना. अच्छा नमस्कार, अजीज भाई अलविदा....रुखसत.
तुम्हारा खैर-अंदेश
भगत सिंह
मार्च 22, 2010
लाल चिरैया
लाल चिरैया
80 के बाद बिहार से आने वाले एक प्रमुख हिंदी कवि सुरेन्द्र स्निग्ध की यह बेहद कोमल कविता आपको बचपन के दिनों में ले जाएँगी.
लिए चोंच में
घास किरन की
पूरब में हर सुबह-सुबह क्यों
लाल चिरैया आती है ?
बैठी मेरे घर की छत पर
देहरी पर
फिर धीरे-धीरे आँगन में भी
घास किरन की छितराती है
उछल-कूदकर शोर मचाती
दाना चुगती, पानी पीती
फिर किरणों की घास समेटे
लिए चोंच में पच्छिम को उड़ जाती है.
80 के बाद बिहार से आने वाले एक प्रमुख हिंदी कवि सुरेन्द्र स्निग्ध की यह बेहद कोमल कविता आपको बचपन के दिनों में ले जाएँगी.
लिए चोंच में
घास किरन की
पूरब में हर सुबह-सुबह क्यों
लाल चिरैया आती है ?
बैठी मेरे घर की छत पर
देहरी पर
फिर धीरे-धीरे आँगन में भी
घास किरन की छितराती है
उछल-कूदकर शोर मचाती
दाना चुगती, पानी पीती
फिर किरणों की घास समेटे
लिए चोंच में पच्छिम को उड़ जाती है.
जल, कविता और गोरैया
जल, कविता और गोरैया के लिए,
विनोद कुमार शुक्ल की यह कविता पढ़िए.
वृक्ष की सूखी
वृक्ष की सूखी
टहनियों के समानांतर
मैंने अपनी
दो सुन्न बाहें फैलाईं
और फुनगी पर एकटक दृष्टि
यह चाहता हूँ
कि जब पानी आये
तो पहले आँखें भिंगों दे
फिर कोई चिड़िया
मेरी बाँहों की हरियाली में
घोंसले बनाये
अंडे दे
विनोद कुमार शुक्ल की यह कविता पढ़िए.
वृक्ष की सूखी
वृक्ष की सूखी
टहनियों के समानांतर
मैंने अपनी
दो सुन्न बाहें फैलाईं
और फुनगी पर एकटक दृष्टि
यह चाहता हूँ
कि जब पानी आये
तो पहले आँखें भिंगों दे
फिर कोई चिड़िया
मेरी बाँहों की हरियाली में
घोंसले बनाये
अंडे दे
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