जुलाई 27, 2010

सावन घन प्राणों में बरसे

सावन आ गया, आया ही नहीं इसका आना दिख भी रहा है, पूरे आषाढ़ बादल रुठे रहे, आते थे पर बरसने को उनकी इच्छा ही नहीं होती थी । अब सावन में पहले ही दिन से घेरे हैं, धरती की प्यास देर से ही सही तृप्त कर रहे हैं ।

सावन पर निराला की दो रचनाएँ -


(1)
प्यासे तुमसे भरकर हरसे ।
सावन घन प्राणों में  बरसे ।

उनयी आँखों में श्याम घटा,
विद्युत की नस-नस नई छटा,

फैली हरियाली अटा-अटा
अंगों के रंगों के परसे ।

अविरत रिमझिम वीणा द्रिमद्रिम;
प्रति छन रेलती पवन पश्चिम
मृदंग वादन, गति अविकृत्रिम
जी के भीतर से, बाहर से ।

(2)

धिक मद, गरजे बदरवा,
चमकि बिजुली डरपावे,
सुहावे सघन झर, नरवा
         कगरवा कगरवा ।

जून 18, 2010

कल्पना वाला बच्चा

शबीह की एक कविता पिछले पोस्ट में दी गई थी, यहाँ उनकी एक दूसरी कविता पढ़िए ।


गुलाब की सेज पर
लेटा, वो बच्चा !
रूई-से बिस्तर पर
सोया, वो बच्चा !

वो बच्चा,
जिसका भोलेपन भरा चेहरा,
प्यार भरी आँखें,
रस भरे होंठ,
किलकारियों भरी आवाज़,
लाल-लाल गाल,
छोटे-छोटे हाथ और पैर
जिसको छूने का मन चाहे,
थामने को दिल चाहे ।

'प्यार करने को कोई ऐसा होता
तो कल्पना सच हो जाती।'

जून 10, 2010

हमारी नयी ज़िंदगी

शबीह ने अभी बारहवीं की परीक्षा पास की है, कविताओं से इन का नाता खून पानी का है, नौ दस साल की होंगी तब से ही शबीह ने कविता के साथ उठना बैठना शुरू कर दिया था, छोटी उम्र में  ही उनकी कविताओं ने अनुभवों की निजता का परिचय दे दिया है, शबीह का पहला संकलन 'हमारी नयी ज़िंदगी ' 2006 में आ चुका है । शमीम हनफी और अरुण कमल ने इसकी भूमिका लिखी है। इस संकलन से इसी शीर्षक वाली कविता, यह नौ दस साल की उम्र में ही लिखी गई थी.................


चाँद की चाँदनी होती है
जो फूलों में जाकर सोती है
नन्हें बच्चों की आवाज़ कैसी होती है ?
चिड़ियों की चहचहाहट -सी होती है । 

फूल तो प्यारे होते हैं
उन्हें छूकर हवा बहती है
उनमें से कुछ पत्तियां बरसती हैं

उन्हीं कोमल फूल की पत्तियों से,
फूल जैसे बच्चों से 
धरती की पवित्रता से,
बहते झरने से,
चाँद-सितारों से, 
बरसते पानी की बूँदों से,
हमारे माँ - बाप से 
शुरू होती है हमारी नयी ज़िंदगी !
                                                 -शबीह राहत 

 

मई 18, 2010

लोकमान्य की कुछ तस्वीरें


लोकमान्य बालगंगाधर तिलक और उनसे जुड़ी  कुछ तस्वीरें ,,,,,,,,,

(ये तस्वीरें प्रभा में 1920 में तिलक महाराज के निधन के पश्चात प्रकाशित हुई थीं, वहीं से इन्हें साभार प्रस्तुत किया जा रहा है । ये तनिक धुँधली जान पड़ सकती हैं, पर 90 वर्षों के बाद भी इनमें इतनी भावना भरी है, कि उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है,  'प्रभा' के संपादक श्री गणेशशंकर विद्यार्थी और श्री देवदत्त शर्मा थे । तिलक 'युवा हृदय सम्राट' थे, इस ब्लॉग में उनसे जुड़ी कुछ और चीजें देने का प्रयास किया जाएगा, बहरहाल ये तस्वीरें देखिए.......