लाल चिरैया
80 के बाद बिहार से आने वाले एक प्रमुख हिंदी कवि सुरेन्द्र स्निग्ध की यह बेहद कोमल कविता आपको बचपन के दिनों में ले जाएँगी.
लिए चोंच में
घास किरन की
पूरब में हर सुबह-सुबह क्यों
लाल चिरैया आती है ?
बैठी मेरे घर की छत पर
देहरी पर
फिर धीरे-धीरे आँगन में भी
घास किरन की छितराती है
उछल-कूदकर शोर मचाती
दाना चुगती, पानी पीती
फिर किरणों की घास समेटे
लिए चोंच में पच्छिम को उड़ जाती है.
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