बेसन की सोंधी रोटी पर
खट्टी चटनी-जैसी माँ
याद आती है चौका बासन
चिमटा, फुकनी जैसी माँ
बान की खुर्रि खाट के ऊपर
हर आहट पर कान धरे
आधी सोई आधी जागी
थकी दोपहरी जैसी माँ
चिड़ियों की चहकार में गूँजे
राधा-मोहन, अली-अली
मुर्गे की आवाज से खुलती
घर की कुंडी जैसी माँ
बीवी,बेटी,बहन,पड़ोसन
थोड़ी-थोड़ी-सी सब में
दिन भर एक रस्सी के ऊपर
चलती नटनी जैसी माँ
बाँट के अपना चेहरा, माथा
आँखें जाने कहाँ गई
फटे पुराने एक अलबम में
चंचल लड़की जैसी माँ
- निदा फ़ाज़ली
5 टिप्पणियां:
एक बेह्द अच्छी रचना पढाने का आभार!
अच्छा लिखा है आपने.
क्या हिंदी ब्लौगिंग के लिए कोई नीति बनानी चाहिए? देखिए
Nida Ji ki ye Rachna har Mother's Day kahin na kahi zurur padhne mil Jati. Achhe Sanklan ki prastuti ke lie Aabhar.
aj ke liye yah ek behtar chunaw hai, jispr comment kewal maun ke jariye dia ja sakta hai...........
मेरे ब्लौग पर आपके मूल्यवान कमेन्ट के लिए धन्यवाद, आशुतोष जी. आपके इस अच्छे ब्लौग को मैंने ब्लॉगरोल में शामिल किया है.
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