जून 10, 2010

हमारी नयी ज़िंदगी

शबीह ने अभी बारहवीं की परीक्षा पास की है, कविताओं से इन का नाता खून पानी का है, नौ दस साल की होंगी तब से ही शबीह ने कविता के साथ उठना बैठना शुरू कर दिया था, छोटी उम्र में  ही उनकी कविताओं ने अनुभवों की निजता का परिचय दे दिया है, शबीह का पहला संकलन 'हमारी नयी ज़िंदगी ' 2006 में आ चुका है । शमीम हनफी और अरुण कमल ने इसकी भूमिका लिखी है। इस संकलन से इसी शीर्षक वाली कविता, यह नौ दस साल की उम्र में ही लिखी गई थी.................


चाँद की चाँदनी होती है
जो फूलों में जाकर सोती है
नन्हें बच्चों की आवाज़ कैसी होती है ?
चिड़ियों की चहचहाहट -सी होती है । 

फूल तो प्यारे होते हैं
उन्हें छूकर हवा बहती है
उनमें से कुछ पत्तियां बरसती हैं

उन्हीं कोमल फूल की पत्तियों से,
फूल जैसे बच्चों से 
धरती की पवित्रता से,
बहते झरने से,
चाँद-सितारों से, 
बरसते पानी की बूँदों से,
हमारे माँ - बाप से 
शुरू होती है हमारी नयी ज़िंदगी !
                                                 -शबीह राहत 

 

मई 18, 2010

लोकमान्य की कुछ तस्वीरें


लोकमान्य बालगंगाधर तिलक और उनसे जुड़ी  कुछ तस्वीरें ,,,,,,,,,

(ये तस्वीरें प्रभा में 1920 में तिलक महाराज के निधन के पश्चात प्रकाशित हुई थीं, वहीं से इन्हें साभार प्रस्तुत किया जा रहा है । ये तनिक धुँधली जान पड़ सकती हैं, पर 90 वर्षों के बाद भी इनमें इतनी भावना भरी है, कि उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है,  'प्रभा' के संपादक श्री गणेशशंकर विद्यार्थी और श्री देवदत्त शर्मा थे । तिलक 'युवा हृदय सम्राट' थे, इस ब्लॉग में उनसे जुड़ी कुछ और चीजें देने का प्रयास किया जाएगा, बहरहाल ये तस्वीरें देखिए....... 

मई 11, 2010

राजेंद्रबाबू मेरे सर-माथे पर

राजेंद्र प्रसाद की ख्याति उनके छात्र जीवन में ही सार्वदेशिक हो गई थी, प्रसिद्ध है कि उनकी उत्तरपुस्तिका पर परीक्षार्थी के परीक्षक से श्रेष्ठ होने की टिप्पणी की गई थी । पटना में हाईकोर्ट खुलने से पहले वे कलकत्ता में वकालत करते थे, वकालत में भी उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया । वे गांधी के सच्चे अनुयायी थे, गांधी की पहली कर्मभूमि ‘चंपारण’ में वे उनके साथ-साथ थे । राजेंद्रबाबू सरलमना थे, एक उदार और करुण हृदय के स्वामी । तामझाम और आडंबर से दूर; गांधी की संगत ने उन्हें और भी तपा दिया था ।


वे बिहार प्रदेश काँग्रेस कमेटी के लंबे समय तक अध्यक्ष भी रहे । उन्हीं दिनों सुभाषचंद्र बोस एक बार पटना आए । राजेंद्रबाबू और सुभाषबाबू से जुड़ा एक संस्मरण रामबुझावनबाबू के खजाने से । (कोशिश की है कि उनके शब्दों में ही प्रस्तुत करूँ)

(प्रो. रामबुझावन सिंह; घर मसौढ़ी, सौ में दस कम यानी नब्बे; इतने ही वर्षों से वे इस दुनिया को देखते आ रहे हैं. और उनकी आँखों में जीवन इतना भरा है कि इतने और वर्षों की यात्रा अभी भी मजे से की जा सकती है, न जाने कितनी पीढ़ियों ने उन्हें देखा और उनसे पढ़ा है, आज के दिन देश के संभवतः सबसे बुजुर्ग शिक्षक. अभी बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् के निदेशक हैं. रामबुझावन बाबू स्मृतियों के कोष हैं, कोशिश करूंगा कि आगे भी उनसे कुछ पाकर आपसे साझा कर सकूं.


सुभाषबाबू पटना स्टेशन पर उतरे । वे स्वामी सहजानंद सरस्वती के निमंत्रण पर पटना आए थे और उन्हें बिहार में पटना समेत कई स्थानों पर सभाएँ करनी थीं । पटना में उनके स्वागत की कुछ अलग ही तैयारी थी । कदमकुआँ के कायस्थ समाज ने प्रण कर लिया था कि सुभाषचंद्र बोस को पटना प्रवेश करने नहीं देंगे । कारण क्या था – कलकत्ता में राजेंद्रबाबू के साथ बंगाली भद्रलोक ने अभद्रता की थी और इस घटना ने यहाँ के लोगों को उद्वेलित कर दिया था, उनका आरोप था कि यह सब सुभाषबाबू के इशारे पर हुआ । और इसी से पटना में उन्हें प्रवेश करने नहीं दिया जाएगा । सुभाषबाबू के इस विशेष स्वागत की तैयारी हो चुकी थी । कदमकुआँ का कायस्थ समाज स्टेशन पर जुट गया था, और इसे देखने के लिए हमारे जैसे छात्र भी जुटे थे, सुभाष बाबू गाड़ी से निकले नहीं कि इनसे घिर गए । कैसे कैसे कर के बाहर निकाले गए । उस दिन लॉन (आज के गांधी मैदान) में उनकी सभा होनी थी नहीं हो पाई । उपद्रवियों की ही चली, सुभाष बाबू उस दिन उत्तरबिहार चले आए और वहाँ सभा की । पटना का कार्यक्रम दूसरे दिन का बना । हम छात्रों में उन्हें सुनने की अलग ही ललक थी, पर सभा तो हो नहीं पाई । पटना मे सभा कैसे हो यह समस्या थी, तब जयप्रकाश नारायण को रांची से खबर दे कर बुलवाया गया । काट जेपी ही थे । जेपी आए और तब कार्यक्रम तय हुआ । सभा के दिन सुभाषबाबू के रास्ते में छात्रों और युवाओं का रेला था । सुभाषबाबू घोड़ागाड़ी पर थे और उनके साथ स्वामी सहजानंद सरस्वती थे, गाड़ी को घोड़ा क्या खींचता, हम छात्र ही खींचे चले आ रहे थे, सुभाषबाबू का जयघोष कर रहे थे, हमारी तनिक जिद्द थी कि उनके मुख से कुछ आशीर्वचन सुन लें, स्वामीजी अनमना रहे थे, वे इसके लिए तैयार नहीं थे ।

 पर सुभाषबाबू तैयार हो गए, कहा ये ही तो देश के भविष्य हैं । घोड़ागाड़ी पर ही खड़े होकर बोलना शुरू कर दिया, वह विराट व्यक्तित्व- क्या कहूँ । और पाँच मिनट तक कहते रहे- क्या समझ में आया, क्या नहीं, याद नहीं । बस सुभाषबाबू की जय करते हुए चले आए । शाम को सभा हुई, जेपी मंच पर बैठे थे और कदमकुआँ का कायस्थ समाज भी, जिन्होंने कोलाहल किया था आज शांत थे, दर्शक थे । जेपी ने अपने धीर-गंभीर स्वर में कहा-आप सब की सुनें, मानना या न मानना आपके ऊपर है । एक एक शब्द इस तरह से जैसे कोई शिक्षक अपने छात्रों को सीखा रहा हो । गहरी नदी की तरह । और जब सुभाषबाबू की बोलने की बारी आई मत पुछो, लगता था जैसे एक-एक शब्द बम हो । उनकी आवाज़ में बम फट रहा हो । शुरू ही किया उन्होंने कौन कहता है राजेंद्रबाबू के साथ अभद्रता में मेरी भूमिका है, अरे, राजेंद्रबाबू को तो मैं अपने माथे पर रखता हूँ । राजेंद्रबाबू को मैं अपने माथे पर रखता हूँ ।  फिर क्या था, कौन कोना था जिधर से तालियों की आवाज़ नहीं आ रही थी और सुभाषबाबू के जयकारे नहीं लग रहे थे ।

मई 09, 2010

बेसन की सोंधी रोटी

बेसन की सोंधी रोटी पर
खट्टी चटनी-जैसी माँ
याद आती है चौका बासन
चिमटा, फुकनी जैसी माँ

बान की खुर्रि खाट के ऊपर
हर आहट पर कान धरे
आधी सोई आधी जागी
थकी दोपहरी जैसी माँ

चिड़ियों की चहकार में गूँजे
राधा-मोहन, अली-अली
मुर्गे की आवाज से खुलती
घर की कुंडी जैसी माँ

बीवी,बेटी,बहन,पड़ोसन
थोड़ी-थोड़ी-सी सब में
दिन भर एक रस्सी के ऊपर
चलती नटनी जैसी माँ

बाँट के अपना चेहरा, माथा
आँखें जाने कहाँ गई
फटे पुराने एक अलबम में
चंचल लड़की जैसी माँ
                              - निदा फ़ाज़ली