अप्रैल 11, 2010

हार-जीत

अशोक वाजपेयी की गद्य-कविता ' हार-जीत ' हिंसा की संस्कृति को बेहद शांत रूप में उघारती है. यह कविता  ताकत , वर्चश्व  और हिंसा के संस्थानों के सच को सामने लाती है. यह युद्ध मात्र का सच प्रकट करती है, स्वाभाविक रूप से  इससे उसके  सम्बद्ध पक्षों का सच भी प्रकट हो जाता है.

वे उत्सव मना रहे हैं. सारे शहर में रौशनी की जा रही है. उन्हें बताया गया है कि
उनकी सेना और रथ विजय प्राप्त कर लौट रहे हैं. नागरिकों में से ज्यादातर को पता
नहीं है कि किस युद्ध में उनकी सेना और शासक गए थे, युद्ध किस बात पर था.
यह भी नहीं कि शत्रु कौन था पर वे विजयपर्व मनाने की तैयारी में व्यस्त हैं. उन्हें सिर्फ
इतना पता है कि उनकी सेना विजय हुई. उनकी से आशय क्या है यह भी स्पष्ट नहीं है :
किसकी विजय हुई सेना की, कि शासक की, कि नागरिकों की ? किसी के पास पूछने
का अवकाश नहीं है. नागरिकों को नहीं पता कि कितने सैनिक गए थे  और कितने
विजयी वापस आ रहे हैं. खेत रहने वालों की सूची अप्रकाशित है. सिर्फ एक बूढ़ा
मशकवाला है जो सड़कों को सींचते हुए कह रहा है कि हम एक बार फिर हार गए हैं
और गाजे बाजे के साथ जीत नहीं हार लौट रही है. उस पर कोइ ध्यान नहीं देता है
और अच्छा यह है कि उस पर सड़कें सींचने भर की जिम्मेवारी है, सच को दर्ज करने
या बोलने की नहीं. जिन पर है वे सेना के साथ ही जीतकर लौट रहे हैं.

1 टिप्पणी:

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत आभार इसे पढ़वाने का..कितना कुछ सोचने को विवश करती है यह रचना.