अप्रैल 01, 2010

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
शुक्लजी की आलोचना और इतिहास दृष्टि की कई विशेषताएँ गिनाई जा सकती हैं. इस पोस्ट में ऐसा कुछ नहीं किया जाएगा. हम ले चलेंगे आपको 'माधुरी' के पन्नों पर. माधुरी के वर्ष १३, खंड ६ संख्या १, में 'सम्पादकीय विचार' में शुक्लजी को  'हिंदी साहित्य सम्मलेन'  का सभापति बनाने के सम्बन्ध में चर्चा थी, इस चर्चा का महत्त्व अपनी जगह पर,  सबसे पहले जो चीज ध्यान खींचती है वह है शुक्लजी की तस्वीर. आप भी देखिए---


टिप्पणी यह थी....
"हमने गत संख्या में महात्माजी के हिंदी साहित्य सम्मलेन के इंदौर में होनेवाले अधिवेशन का सभापति चुने जाने का संवाद प्रकाशित कर इस उत्कृष्ट चुनाव के सम्बन्ध में हर्ष प्रकट किया था. पर हमें खेद है कि यह समाचार गलत निकला. हिंदी पत्रों में किसी ने यह गलत समाचार छपा दिया था. अब मालूम हुआ है कि इंदौर साहित्य सम्मलेन के कार्यकर्ताओं ने पूज्यपाद मदनमोहन जी मालवीय को सभापति चुना है और मालवीय जी ने इस शर्त पर उनकी प्रार्थना स्वीकार भी कर ली है कि अधिवेशन तक अगर उनका स्वास्थ्य ठीक रहा अथवा कुछ राजनीतिक कारणों से उन्हें विलायत न  जाना पड़ा तो वह अवश्य सभापति पद को अलंकृत करेंगे. इसमें संदेह नहीं कि मालवीयजी यदि सभापति हो सके तो सम्मलेन का सर्वोपरि सौभाग्य होगा. परन्तु हमारा ख्याल है कि मालवीयजी का स्वास्थ्य यदि ठीक रहा, ईश्वर करे, ऐसा ही हो- तो वह विलायत अवश्य जायेंगे. इसलिए उनके सभापति बन सकने की सम्भावना बहुत कम है. ऐसी परिस्थिति में सम्मलेन के लिए फिर सभापति का निर्वाचन अनिवार्य हो जाएगा. यदि ऐसा हो तो हम सम्मलेन के कर्णधारों के आगे पुनः काशी के पंडित रामचंद्र शुक्ल का नाम उपस्थित करना अपना कर्तव्य समझते हैं. शुक्लजी कितने बड़े अंग्रेजी और हिंदी साहित्य के विद्वान हैं, भाषा विज्ञान के कितने बड़े आचार्य हैं, समालोचना करने में कितने दक्ष हैं, उनका अध्ययन कितना गंभीर और विशाल है, यह अभी साधारण हिंदी पाठक शायद नहीं जानते. इसका कारण यही है कि आप आत्म-विज्ञापन से कोसों दूर रहकर साधना में लगे रहते हैं. आपने हिंदी साहित्य के उत्थान और अभ्युदय के लिए जो कुछ किया है, उसका मूल्य बहुत अधिक है. हमारी तो दृढ़ धारणा है कि अकेले शुक्लजी ने जितनी हिंदी सेवा की है उतनी हिंदी के दस-बीस धुरंधर सम्राटों ने भी मिलकर न की होगी. आपने जायसी, तुलसी और सूर की रचनाओं पर जो प्रकाश डाला है वह अद्भूत, अभूतपूर्व और अनवद्य है. आप अंग्रेजी और हिंदी के ही नहीं, संस्कृत, फारसी और बंग्ला के भी अच्छे ज्ञाता हैं. ऐसे विद्वान की अधिक समय तक उपेक्षा करना सम्मलेन और हिंदी-भाषी जनता, दोनों के लिए लज्जाजनक और मूर्खता का परिचायक होगा. हम जानते हैं कि शुक्लजी इस सम्मान के लिए लालायित नहीं हैं.पर हमारा भी तो कुछ कर्त्तव्य है. सम्मलेन के सभापति-पद से शुक्लजी का नहीं, बल्कि शुक्लजी के सभापतित्व से सम्मलेन का गौरव बढ़ेगा. हमें आशा है सम्मलेन के कर्णधार और हिन्दीप्रेमी जनता हमारी इन पंक्तियों पर अवश्य ध्यान देगी. हमारी उपेक्षा से ही सम्मलेन स्व. पंडित बालकृष्ण जी भट्ट पूज्यपाद आचार्य द्विवेदीजी - जैसे सुयोग्य विद्वानों का सम्मान करने के सौभाग्य से वंचित हो चुका है.सम्मलेन के कर्णधारों को पहले अधिकारियों की ओर दृष्टिपात करना चाहिए. इसी से सम्मलेन का गौरव बढ़ेगा और साहित्य की भी श्रीवृद्धि होगी. अधिक प्रसिद्धि की अपेक्षा ठोस काम और साहित्य-सेवा पर ही सभापति की चुनाव में ध्यान देना चाहिए.
शुक्लजी को नमन.

   

4 टिप्‍पणियां:

अनुनाद सिंह ने कहा…

यह दुर्लभ सम्पादकीपढ़ाने के लिये साधुवाद।

anuradha srivastav ने कहा…

आचार्य जी जैसी प्रतिभा विरलों में ही होती है। सही मायने में विशिष्ट सम्पादकीय प्रस्तुत करने के लिये साधुवाद।

anuradh srivastav ने कहा…

आचार्य जी जैसी प्रतिभा विरलों में ही होती है। सही मायने में विशिष्ट सम्पादकीय प्रस्तुत करने के लिये साधुवाद।

anuradh srivastav ने कहा…

आचार्य जी जैसी प्रतिभा विरलों में ही होती है। सही मायने में विशिष्ट सम्पादकीय प्रस्तुत करने के लिये साधुवाद।