मई 04, 2010

'चाँद' से दो चिट्ठियाँ

'चाँद' हिंदी की एक चर्चित पत्रिका थी, साहित्यिक, सामाजिक और समकालीन राजनितिक विषय इसमें स्थान पाते थे, इसकी दृष्टि संकोचरहित थी. सुधारात्मक उत्साह के साथ यह देशोत्थान का लक्ष्य रखती थी. इसके 'मारवाड़ी' और 'फांसी' अंकों का ऐतिहासिक महत्त्व  है. पत्रिका के तेवर तो ऐसे थे कि वह प्रेमचंद को टिप्पणियों को  चुनौती देने में नहीं हिचकती थी.  १९२३ से इस पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ हुआ था, इलाहबाद से;  रामरख सिंह सहगल, महादेवी वर्मा आदि इसके सम्पादक रहे.
'चाँद' में सम्पादकीय टिप्पणियों और पाठकों के पत्रों के लिए भी स्थान था. सम्पादक पाठकों की समस्याओं पर सुझाव देते थे, समस्याएँ प्रायः पाठिकाओं की होती थीं. इसके साथ ही उसमें  कुछ ऐसे पत्र भी प्रकाशित होते थे, जो समाज  में स्त्रियों के हालात को बहुत तल्ख़ रूप में व्यक्त करते थे. यहाँ ऐसे दो पत्र प्रस्तुत हैं, पहला पत्र मई १९३० का है और दूसरा जून १९३० का.

1 टिप्पणी:

शरद कोकास ने कहा…

वाह । चाँद का हमने सिर्फ नाम ही सुना था । यहाँ यह पत्रिका देखने को मिल गई । धन्य्वाद इसके लिये बहुत छोटा शब्द होगा ।