मई 06, 2010

जाना खुदा के पास है

के.के.दत्ता की एक किताब है, WRITINGS AND SPEECHES OF GANDHI JI RELATING TO BIHAR : FROM 1917-1947 . कुछ दूसरी चीजें तलाशते हुए यह  किताब दिख गयी, उलट-पुलट कर देखा तो सबसे पहले इसमें जगह पाई तस्वीरों ने अपना ध्यान खिंचा. इस किताब में कई तस्वीरें डाली गयी हैं. पुस्तक के अंतिम पृष्ठों में गांधीजी की कई तस्वीरें हैं. १९४७ में पटना के मसौढ़ी थाने के दंगा प्रभावित क्षेत्रों  में घूमते हुए, जनसमूह को संबोधित करते हुए. मसौढ़ी अब अनुमंडल है. सन ४७  में यह दंगों के कारण चर्चा में आया था. यों पिछले तीन दशकों से यह नक्सली गतिविधियों के लिए विशेष चर्चित रहा है. 'छह इंच छोटा कर देना' यहाँ का चलता हुआ और ख्यात मुहावरा है. कस्बाई रंगत वाला यह क्षेत्र तकनीक, मोबाइल और ऐसी तमाम चीजों से जुड़े होने पर भी शहरों की आबो-हवा से अधिक गंवई पहचान को बनाये रखने में अधिक यकीन रखता है. पटना और जहानाबाद के लगभग बीच में स्थित  मसौढ़ी की यह पहचान कितने दिनों तक बची और बनी रहती है, यह देखना है ....  ..

 गाँधी के साथ तस्वीरों में 'सीमांत गाँधी' खान अब्दुल गफ्फार खाँ  और प्रो.अब्दुल बारी प्रमुखता से दिखाई पड़ते हैं.  बिहार में हो रहे दंगों की  भयावहता सुन-जान गाँधी यहाँ आए थे,या कहें कि बुलाए गए थे. सुबह की प्रार्थना करते और फिर दिन भर वे पटना के आस-पास के इलाकों में घूमते रहते थे. यहाँ दंगों के नेपथ्य की चर्चा नहीं करूंगा, वह किसी और दिन. यहाँ तो गाँधी की बात होगी और उसी बहाने कुछ दूसरी चीजें. मसौढ़ी तो मसौढ़ी पटना का गाँधी मैदान इससे पहले 'गाँधी मैदान' नहीं कहलाता था. गाँधी की प्रार्थनाओं और सभाओं ने इसे 'गाँधी मैदान' बना दिया. पटना का 'गाँधी मैदान' इससे पहले 'लॉन' कहलाता था. जगह- जगह भटकते हुए, दंगों की आग और पीड़ा अपने कलेजे पर महसूस कर और अपने भर पीड़ितों के दुख  को कम कर गाँधी शाम को फिर पटना आ जाते. इन दंगों की पहली जानकारी मुझे सफ़दर सर (प्रो. सफ़दर इमाम कादरी) से मिली थी, उन्हीं दिनों मैंने गाँधी को समझने की पहली कोशिश  की थी, किताबों और उनमें दर्ज 'इतिहास' से अलग. (यह चर्चा फिर कभी, अभी मसौढ़ी की बात.) के.के. दत्ता की किताब ने इतिहास के इस अध्याय को तनिक निकट से देखने और जानने के लिए उकसाया.
मसौढ़ी की बात किससे पूछता, किस किताब में ढूंढ़ता, वह किताब जो ४७ के पन्नों से मसौढ़ी के दुःख और पीड़ा और छटपटाहट और उजड़ने को सामने ले आये. धरती के इस कोने में खड़े गाँधी की बेचैनी को सामने ले आये !    
रामबुझावन बाबू (प्रो. रामबुझावन सिंह) से जब यह प्रसंग छेड़ा तो जिसकी उम्मीद थी वही हुआ, पन्ने पलटे तो जो सुना वही सुनाने की कोशिश कर रहा हूँ.
(प्रो. रामबुझावन सिंह;  घर मसौढ़ी, सौ में दस कम यानी नब्बे; इतने ही वर्षों से वे इस दुनिया को देखते आ रहे हैं. और उनकी आँखों में जीवन इतना भरा है कि इतने और वर्षों की यात्रा अभी भी मजे से की जा सकती है, न जाने कितनी पीढ़ियों ने उन्हें देखा और उनसे पढ़ा है, आज के दिन देश  के  संभवतः सबसे बुजुर्ग शिक्षक. अभी बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् के निदेशक हैं. रामबुझावन बाबू स्मृतियों के कोष हैं, कोशिश करूंगा कि आगे भी उनसे कुछ पाकर आपसे साझा कर सकूं.)
मैं तब दरभंगा के सी. एम. कॉलेज में था. मसौढ़ी की खबर सुनकर चल पड़ा, सोनपुर के पहलेजा में जहाज पकड़ा. जहाज खुलने वाला था, छलांग लागाकर पकड़ा. पर यह क्या, जहाज पर कोई सवारी नहीं थी सिवाए मेरे. डर लगा. कब क्या हो जाए. कुछ अनहोनी न हो  जाये यह सोचते हुए मन कांपता रहा. क्रूज के लोग कुछ कर न डालें यह सोच उन्हीं के पास हो लिया, उनसे पूछा कि और सवारी कहाँ हैं तो जवाब मिला- जानते नहीं है, कैसा माहौल है. जब जहाज उतरा तो पटने में रात के सन्नाटे के अलावे भी कुछ और था. उस अन्धकार में खौफ घुला था. रात अपने मौसेरे भाई के यहाँ टिककर सुबह मसौढ़ी पंहुचा. और मसौढ़ी का दृश्य मत पूछो. घृणा और हिंसा के खेल के बाद वहां गाँधी पहुँच चुके थे. सुबह में प्रार्थनाएं होती थीं, उनके सन्देश होते थे.
 मसौढ़ी में जम कर दंगे हुए थे, बंगाल का बदला लिया गया था.  हिंसा ऐसी कि उसकी याद भी रूह कँपा दे, लोग गांवों से भाग रहे थे. पर भाग कहाँ पाते थे उससे पहले ही अपनी जान गँवा देते थे. मसौढ़ी रेलवे का पश्चिमी प्लेटफ़ॉर्म लाशों से पट गया था. अपने घरों और गांवों को छोड़ने वाले मसौढ़ी को नहीं छोड़ पाए. जो लाशें बिछीं उनमें आधे को जला भी दिया गया ताकि मामला बराबरी का दिखे. कितनी लाशें मोरहन में बहा दी गईं, मोरहन का पानी लाल हो गया. कौए उसमें बहती लाशों पर बैठे रहते थे, ऐसी मार-काट मची थी.
जान लेने के लिए कई तरीके अपनाए गए, लोग भाग कर मसौढ़ी स्टेशन पहुँचते थे पर उन्हें यहाँ से जाने नहीं दिया जाता था. स्टेशन के पास ही एक जमींदार का चावल मिल था, उसमें एक भोंपू (सायरन) लगा था. जब लोग स्टेशन पर इकट्ठे हुए तो यह बज उठा, पर इसकी आवाज़ हमेशा से अलग थी. इसमें कुछ अलग सन्देश था. दंगाई जुट गए और लोग मारे गए. अपने घरों से उजड़ कर आए लोग जान बचाने के लिए एक कमरे में बंद हो गए और लोग इतने, कि कमरे में हवा भी नहीं अट सकती थी. कमरे को उन्होंने अन्दर से बंद कर लिया. अब लोग बाहर कैसे आएं, मारनेवालों के सामने यह समस्या थी, दरवाज़ा बंद था,  उसे कैसे खुलवाया जाए. तब किरोसिन में कपड़े भिंगोकर जलाकर कमरे में ऊपर से डाले गए, और इस तरह दरवाज़ा खुल गया. और लोग....
गाँधी मसौढ़ी पहुँच गए थे. लोग अपने गाँव, कब्र में दफन पुरखों की हड्डियाँ छोड़ कर जा रहे  थे. गाँधी किसे रोकते, जब कोई रुकनेवाला ही नहीं था. बस यही पूछते थे, कहाँ घर है. कहाँ जाओगे ? जवाब मिलता- पश्चिमी पाकिस्तान. वे सिर भी नहीं उठाते थे. झुके हुए माथे से, बस यही एक ठहरी हुई आवाज़ किसी तरह निकल पाती थी- कहाँ  घर है. कहाँ जाओगे ? वे किसे रोकते और भला क्यों ? गांधीजी के सामने हजरत साईं गाँव के लोग खड़े थे. सवाल वही था- कहाँ जाओगे ? जो उत्तर मिलता उसे सरकारी अमला लिखता जाता. पर सिर्फ लिखता ही जाता था, गाँधी के भीतर तो कुछ टूटता,घटता जाता था. उन्होंने सवाल पुछा-कहाँ जाओगे ? जवाब मिला- खुदा मियां के घर ! गाँधी का झुका हुआ माथा उठा, सामने एक लम्बा, मजबूत कद काठी का, बड़ाहिल सा शख्स खड़ा था. मसौढ़ी की मिट्टी की तुर्शी उसके समूचे वजूद में घुली थी.यह अलग ही जवाब था जिसे गाँधी ने अब तक नहीं सुना था. वे देखते रहे. फिर पूछा- पर रहोगे कहाँ ? उसी अपने गाँव में, हजरत साईं में, जहाँ मेरे बाप-दादा की,सात पीढ़ियों की हड्डियाँ दफन हैं. जवाब मिला. गाँधी की आँखों में पहली बार चमक आई. पास खड़े खान अब्दुल गफ्फार खाँ की ओर ताका और इस जुबांदराज की पीठ ठोकते हुए कहा- शाबाश ! फिर क्या था, सिलसिला ही चल पडा, 'कहाँ जाओगे' के जवाब में अब शायद किसी ने ही कहा-पाकिस्तान. उस्मान मियाँ तो हीरो हो गए. गाँधी बुदबुदाते रहे, दुहराते रहे- रहना अपने गाँव में है, रहना अपने गाँव में है.
एस. डी. ओ. ने उस्मान मियाँ को अलग ला कर कहा, उस्मान साहब आप कहें तो बन्दूक का लाएसेंस आपको मिल जाए. उस्मान मियाँ ने टका सा जवाब दिया-जिन्हें दिया था उनकी जान बच गयी क्या ? अरे, जो गोतिए की तरह साथ में रहते आ रहे हैं उनसे जान न बची तो आपकी बन्दूक क्या जान बचाएगी ? रखिए अपना लाएसेंस और अपनी बन्दूक.
  
    

2 टिप्‍पणियां:

honesty project democracy ने कहा…

रामबुझावन बाबु को मेरा नमस्कार ,मैं भी कोशिस करूंगा उनसे मिलने की /उम्दा विचारणीय प्रस्तुती /

शरद कोकास ने कहा…

मसौढ़ी का नाम पढ़ा तो सबसे पहले बाबा नागार्जुन याद आये । वे भी वहाँ के ऐसे ही किस्से सुनाया करते थे । आपने इतिहास का यह एक नया पृष्ठ यहाँ खोला है । यह सब चीज़ें दर्ज की जानी चाहिये ।