मार्च 22, 2010

जल, कविता और गोरैया

जल, कविता और गोरैया के लिए,
विनोद कुमार शुक्ल की यह  कविता पढ़िए.

वृक्ष की सूखी

वृक्ष की सूखी
टहनियों के समानांतर
मैंने अपनी
दो सुन्न बाहें फैलाईं
और फुनगी पर एकटक दृष्टि

यह चाहता हूँ
कि जब पानी आये
तो पहले आँखें भिंगों दे

फिर कोई चिड़िया
 मेरी बाँहों की हरियाली में
घोंसले बनाये
अंडे दे

2 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

vinod ji ki yeh kavita kis sankalan ki hai?

AAPNI BHASHA - AAPNI BAAT ने कहा…

vah! aashutoshji behad shukriyaa.. aapka chayan hi aapke vyaktitwa ka aaina hai. khushi hui aapke blog par aakar.