मार्च 23, 2010

भगत सिंह और प्रेमचंद

भगत सिंह और प्रेमचंद
भगत सिंह और गाँधी के सम्बन्ध कभी एक रैखिक रूप से  व्याख्यायित नहीं किये  जा सकते.गाँधी ने क्या कहा, यह  महत्वपूर्ण तो हैं ही गाँधी के अनुयायिओं ने, जो देश के बौद्धिक प्रतिनिधि भी कहलाते थे, और हैं. भगत सिंह और देश के क्रन्तिकारी आन्दोलन के सम्बन्ध में क्या विचार रखते थे, यह गौरतलब है. प्रेमचंद एक ऐसे ही लेखक विचारक हैं. यहाँ उनके विचारों को देखना गैर मुनासिब नहीं होगा. प्रेमचंद ने एक तरह से भारतीय राजनीति की, कांग्रेस की राजनीति की, गाँधी की राजनीति की डेली रिपोर्टिंग की है. नेहरू,पटेल से लेकर कई राजनेताओं और महत्वपूर्ण राजनितिक गतिविधियों पर पर उनकी टिप्पणियां  आती हैं, पर उनके समूचे साहित्य में कहीं भी भगत सिंह  नहीं आते, सिवाए एक सन्दर्भ के. भगत सिंह की शहादत के एक ही दिन बाद २४ मार्च को वे पत्र में इस घटना का उल्लेख करते हैं. देखना जरूरी है की प्रेमचंद की भाषा क्या है, शब्द क्या हैं. संवेदना क्या है, ..

वे लिखते हैं-
"कराची का इरादा था मगर आज भगत सिंह की फांसी ने हिम्मत तोड़ दी. अब किस उम्मीद पर जाऊं. वहां गाँधी का मजाक उड़ेगा, कांग्रेस ग़ैर जिम्मेदार, शोरिसपसंद तबके के हाथ में जाएगी और हम लोगों के लिए उसमें  जगह नहीं है. आइंदा क्या तर्ज़े अमल अख्तियार करना पड़े  कह नहीं सकता मगर फिलहाल दिल बैठ गया है और मुस्तकबिल बिलकुल तारीक नज़र आता है. इधर बनारस, मिर्ज़ापुर, आगरे में जो हालात हुए उनसे गवर्नमेंट का हौसला बढ़ेगा यही मेरा कयास है. मगर इससे ज्यादा हिमाक़त कोई गवर्नमेंट नहीं कर सकती थी.तीन आदमियों की सज़ा में तबदीली करके गवर्नमेंट कितना अच्छा असर पैदा कर सकती थी. पर उसके तर्ज़े-अमल ने अब साबित कर दिया कि तालीफे कल्ब उसने अभी तक नहीं किया और अब भी वह अपनी उसी क़दीम ग़ैर जिम्मेदाराना रविश पर कायम है."
गाँधी के साथ कराची अधिवेशन में क्या हुआ, यह इतिहास की किताबों में दर्ज है. पर हम यह देखें कि प्रेमचंद सज़ा के होने पर सवाल न उठा कर उसके रूप-परिवर्तन और उस बहाने सरकार के उदार रूप प्रदर्शन की चर्चा पर ही टिके रहते हैं.यह प्रेमचंद की समझ थी, यह प्रेमचंद की वास्तविक समझ थी. जो किसी लेख, कहानी, अखबारी लेखन में नहीं पत्र में व्यक्त हुई थी. गाँधी का प्रभाव ऐसा था, प्रेमचंद के साहित्य से इस मौके पर एक और उदहारण पेश है. १९३१ का साल कई कारणों से महत्त्व पूर्ण है, इस वर्ष आजाद, भगत सिंह और उनके साथी, गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे कई सपूतों ने देश के लिए अपने प्राण त्यागे थे. इसी १९३१ के जून महीने में 'हंस' में प्रेमचंद ने 'देश की वर्तमान परिस्थिति' पर अपने विचार रखे. उसी टिप्पणी से ये अंश प्रस्तुत हैं.
महात्मा गाँधी क्रांति नहीं चाहते और न क्रांति से आज तक किसी  जाति  का उद्धार हुआ है. महात्मा जी ने हमें जो मार्ग बतलाया, उससे क्रांति की भीषणता के बिना ही क्रांति के लाभ प्राप्त हो सकते हैं, लेकिन एक ओर सरकार और उसके पिट्ठू जमींदार और दूसरी ओर हमारे कुछ तेजदम और जोशिले कार्यकर्ता नादिरशाह बने हुए क्रांति का सामान पैदा कर रहे हैं. सरकार से तो हमें कोई शिकायत नहीं. ............हमें तो शिकायत अपने उन जोशीले भाइयों से है जो  महात्मा जी के किए धरे को मिट्टी में मिला रहे हैं. हमारी जीत पहले भी धर्म पर  जमे  रहने  में थी,अब भी है और आगे भी रहेगी. हमने सरकार से जो समझौता किया है, उस पर हमें दृढ़ता के साथ डटे रहना चाहिए. हाथी के दांत दिखाने के और, और खाने के और वाली नीति पर चलने में हमारा कल्याण नहीं है, एक साथ युद्ध और शांति  दोनों की दुहाई न देनी चाहिए,......... इन वीर पुरुषों में होड़ सी लगी हुई है कि कौन गर्म से गर्म बात कहकर जनता पर अपने नेतृत्व का सिक्का जमा दे. सच्चा लीडर हम उसे कहेंगे, जो देश को धर्म के रस्ते पर चलाये, जिसके कर्म और वचन में कोई अंतर न हो, जो भीतर से भी वैसा हो, जैसा बाहर से. बार-बार कहना कि हमें युद्ध के लिए तैयार रहना चाहिए, मानों समझौते की मुहलत केवल इसलिए मिली है कि युद्ध की तयारी की जाये, देश को धोखा देना है. देश को भारतीय चर्चिलों और राथरमियरों से बचाने की जरुरत है, वर्ना यह लोग स्वराज्य  संग्राम को रक्तमय बनाकर इसे बदनाम कर देंगे और संसार की सहानुभूति खो बैठेंगे..........
प्रेमचंद के विचारों को तात्कालिक स्थितियों के सन्दर्भ में व्याख्यायित कर के पूरी तरह मुक्त नहीं किया जा सकता है. एक बार बस यही सोचें कि 'नादिरशाह' कौन थे.
रही बात स्वतंत्रता आन्दोलन का श्रेय लेने कि तो क्या कहा जाये, कांग्रेसियों से अधिक चतुर सुजान कौन हो सकता था, इतिहास की मनमानी व्याख्या का जहाँ तक प्रश्न है भगवाधारियों से अधिक इसमें और कौन माहिर हो सकता था.

4 टिप्‍पणियां:

सत्यनारायण सोनी की हिंदी कवितायेँ ने कहा…

bahut achha likhte hain aap. mai bhi kavita me dilchspi rakhta hun. hamare blog par padharna ji aur apni raay se awgt krwana ji..

Dinesh ने कहा…

अति सुन्दर एवं सफल प्रयास .इतिहास को छलयोजित करने की परम्परा तो अंपने यहाँ सदियों से चली आ रही है ,आज़ादी से पहले संसद मे दो बार सरकार बना कर long live queen गाने और आज स्वतन्त्रता का सारा श्रेय लेने वाली कांग्रेस को सटीक जबाब .

bihari jee ने कहा…

apke is naye kadam ne utsahit kiya, bahas ke mudde bhi achhe hain. chunav ka to kahna hi kya,
kisi bhi andolan mein kuchh paristhitiyan dikhayi jati hain aur kuchh dekhi jati hain, dekhne ka kam jagruk karte hain, dikhane ka kam patrakar: premchand jagruk bhi the aur patrakar bhi, unhone kuchh aisa jarur dekha hoga jise dikhana munasib na tha, unhone tatkalin paristhitiyon mein aisa kya deka ? ise gahrai mein jakar pakdne ki jarurat hai. gandhi ji aur premchand ki tarah bhagat singh pr bhi shodh hona chahiye. Bhagat singh ke chand dastavej unke samgra krititwa ka pratinidhitwa nahin karte. bharat mein shodh ki pravriti prashansatmak hai. shodh karte samay satyanveshi drishti apnani chahiye. is sandarbh mein apke prayas shlaghya hain. meri shubhkana !

RAJ SINH ने कहा…

biharee jee se poornatah sahmat .