मार्च 22, 2010

लाल चिरैया

लाल चिरैया
80 के बाद बिहार से आने वाले एक प्रमुख हिंदी कवि सुरेन्द्र स्निग्ध की यह बेहद कोमल कविता आपको बचपन के दिनों में ले जाएँगी.

लिए चोंच में
घास किरन की
पूरब में हर सुबह-सुबह क्यों
लाल चिरैया आती है ?

बैठी मेरे घर की छत पर
देहरी पर
फिर धीरे-धीरे आँगन में भी
घास किरन की छितराती है

उछल-कूदकर शोर मचाती
दाना चुगती, पानी पीती
फिर किरणों की घास समेटे
लिए चोंच में पच्छिम को उड़ जाती है.

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